विकसित भारत जी-राम-जी : नामकरण से आगे की कसौटी


दीपक भारद्वाज | महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम—मनरेगा—देश की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में से एक रहा है। इसका मूल उद्देश्य ग्रामीण गरीबों को 100 दिनों के रोजगार की कानूनी गारंटी देकर आजीविका का सहारा देना और पलायन रोकना था। समय के साथ इस योजना ने करोड़ों परिवारों को संकट के समय राहत दी, पर साथ ही यह घोटालों, अनियमितताओं, फर्जी जॉब कार्ड, मस्टर रोल में हेराफेरी और भुगतान में देरी जैसी समस्याओं के लिए भी चर्चा में रही। हाल के दिनों में सरकार द्वारा मनरेगा का नाम बदलकर विकसित भारत जी-राम-जी किए जाने की घोषणा ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है क्या नाम बदलने से योजना की आत्मा बदलेगी? क्या इससे व्यवस्था में सुधार आएगा, या यह केवल प्रतीकात्मक परिवर्तन भर है? मनरेगा के क्रियान्वयन में उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में समस्याएँ लंबे समय से दर्ज की जाती रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में मंडल स्तर पर मनरेगा लोकपालों की नियुक्ति की गई।

ताकि शिकायतों की जांच हो, जवाबदेही तय हो और दोषियों पर कार्रवाई हो सके। लेकिन व्यवहार में लोकपाल व्यवस्था अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा पाई। शिकायतों का निस्तारण धीमा रहा, रिपोर्टें बनीं पर ठोस कार्रवाई कम हुई। जब दंड का भय नहीं होता, तो अनियमितताओं की पुनरावृत्ति स्वाभाविक है। यह सवाल इसलिए भी अहम है कि व्यवस्था सुधारने के लिए संस्थागत सुधार चाहिए, न कि केवल नामकरण। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में मनरेगा के तहत 100 दिनों के रोजगार की गारंटी पर लगभग 254 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिलती है। अब सरकार द्वारा 125 दिनों के रोजगार की गारंटी की बात कही जा रही है। पहली नजर में यह कदम सकारात्मक प्रतीत होता है काम के दिनों में वृद्धि से ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ सकती है।
लेकिन यहां दो अहम प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या अतिरिक्त 25 दिनों के लिए पर्याप्त बजटीय प्रावधान और समय पर भुगतान सुनिश्चित होगा? दूसरा, क्या मजदूरी दर महंगाई के अनुरूप है? यदि मजदूरी दर स्थिर रहती है और भुगतान में देरी होती है, तो रोजगार के दिनों की बढ़ोतरी का लाभ सीमित ही रहेगा। नाम बदलने का प्रश्न केवल प्रतीक का नहीं, नीति की दिशा का भी है। किसी योजना का नाम उसकी पहचान बनता है, पर उसका प्रभाव उसकी संरचना, क्रियान्वयन और निगरानी से तय होता है। विकसित भारत जैसे शब्द भविष्य की आकांक्षा को दशार्ते हैं, और राम जैसे सांस्कृतिक प्रतीक भावनात्मक जुड़ाव पैदा करते हैं। लेकिन क्या इन प्रतीकों से फर्जी जॉब कार्ड रुकेंगे? क्या इससे डिजिटल भुगतान में होने वाली देरी समाप्त होगी? क्या इससे ठेकेदारीकरण, मशीनों के उपयोग और मजदूरों की जगह बिचौलियों के हावी होने जैसी समस्याएँ खत्म होंगी? इन प्रश्नों का उत्तर नाम में नहीं, प्रणाली में छिपा है।
मनरेगा की सबसे बड़ी ताकत उसकी मांग-आधारित प्रकृति है—काम मांगने पर काम देना। पर व्यवहार में कई जगह काम की मांग दर्ज ही नहीं होती, या पंचायत स्तर पर सीमित काम उपलब्ध कराया जाता है। सामाजिक अंकेक्षण (सोशल आॅडिट) को इसीलिए मजबूत किया गया था, ताकि समुदाय स्वयं निगरानी करे। लेकिन सोशल आॅडिट इकाइयों की स्वतंत्रता, संसाधन और अनुशंसाओं पर कार्रवाई—इन तीनों में खामियां बनी रहीं। यदि सरकार वास्तव में मनरेगा में रामराज्य जैसी पारदर्शिता और न्याय चाहती है, तो सोशल आॅडिट को दांत देने होंगे—अनुशंसाओं पर समयबद्ध कार्रवाई अनिवार्य करनी होगी। भुगतान की समस्या मनरेगा की विश्वसनीयता को सबसे अधिक प्रभावित करती है। मजदूर काम करता है, पर भुगतान हफ्तों या महीनों बाद मिलता है। तकनीकी गड़बड़ियाँ, आधार-आधारित भुगतान में त्रुटियाँ, बैंकिंग अवसंरचना की कमी—ये सब मजदूर की मेहनत को सजा में बदल देती हैं। नाम बदलने से ये तकनीकी और प्रशासनिक समस्याएँ दूर नहीं होंगी। इसके लिए सरल भुगतान प्रणालियाँ, समय-सीमा का कठोर पालन और देरी पर स्वत: मुआवजा—इन सुधारों की जरूरत है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू है परिसंपत्ति सृजन। मनरेगा का उद्देश्य केवल मजदूरी देना नहीं, बल्कि टिकाऊ ग्रामीण परिसंपत्तियाँ बनाना भी है—तालाब, जल संरक्षण संरचनाएँ, सड़कें, वृक्षारोपण। यदि काम की गुणवत्ता सुधरे, तकनीकी निगरानी मजबूत हो और स्थानीय जरूरतों के अनुसार कार्य हों, तो योजना का सामाजिक लाभ कई गुना बढ़ सकता है। पर जब लक्ष्य केवल खर्च दिखाने तक सीमित हो जाता है, तब गुणवत्ता गिरती है। नाम बदलने के साथ यदि कार्यों की प्राथमिकता, तकनीकी स्वीकृति और गुणवत्ता परीक्षण में सुधार न हुआ, तो परिणाम वही रहेंगे। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो नाम परिवर्तन अक्सर संदेश देने का माध्यम होता है। यह सरकार की प्राथमिकताओं और वैचारिक दिशा को रेखांकित करता है। पर लोकतंत्र में नीति का मूल्यांकन परिणामों से होता है।
यदि नए नाम के साथ जवाबदेही, पारदर्शिता और सुधारों का रोडमैप न हो, तो जनता इसे सतही बदलाव मान सकती है। ग्रामीण मजदूर के लिए योजना का नाम नहीं, उसका समय पर भुगतान, सम्मान और काम की उपलब्धता मायने रखती है।
अंतत: प्रश्न यही है—क्या नाम बदलने से मनरेगा में ‘राम’ होगा? यदि ‘राम’ का अर्थ न्याय, मयार्दा और सुशासन है, तो इसका उत्तर तभी ‘हाँ’ हो सकता है जब शासन व्यवस्था में ठोस सुधार हों। लोकपाल को अधिकार और स्वतंत्रता मिले, सोशल आॅडिट प्रभावी हो, भुगतान समय पर हो, मजदूरी दर महंगाई के अनुरूप बढ़े, और काम की गुणवत्ता सुधरे। बिना इन सुधारों के नाम परिवर्तन केवल एक प्रतीकात्मक कदम रहेगा।
मनरेगा जैसी योजना का भविष्य नाम में नहीं, नीयत और नीति में छिपा है। यदि सरकार नाम बदलने के साथ-साथ इन बुनियादी समस्याओं का समाधान करती है, तो यह परिवर्तन सार्थक सिद्ध हो सकता है। अन्यथा सवाल बना रहेगा—नाम बदला, पर क्या व्यवस्था बदली? यही कसौटी तय करेगी कि मनरेगा वास्तव में ‘विकसित भारत’ की ओर कदम बढ़ा रही है या नहीं।
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