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Tuesday, February 3, 2026
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सुप्रीम कोर्ट की फटकार: केंद्रीय शासन और प्रवर्तन निदेशालय की निकटता पर गंभीर सवाल

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सुप्रीम कोर्ट की फटकार: केंद्रीय शासन और प्रवर्तन निदेशालय की निकटता पर गंभीर सवाल

आदेश प्रधान एडवोकेट

आदेश प्रधान एडवोकेट | भारतीय लोकतंत्र एक ऐसी प्रणाली है, जिसकी नींव न्याय, स्वतंत्रता, समता और गरिमा जैसे मूलभूत सिद्धांतों पर टिकी हुई है। इस लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि संवैधानिक संस्थाएँ स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह बनी रहें। जब इन संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो वह केवल एक संस्था नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पूरी संरचना पर आघात होता है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय की भूमिका और उसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की, जो इस दिशा में एक चेतावनी के समान है।

प्रवर्तन निदेशालय: भूमिका और उद्देश्य-

प्रवर्तन निदेशालय भारत सरकार की एक विशेष जांच एजेंसी है, इसका मूल उद्देश्य आर्थिक अपराधों पर नियंत्रण, काले धन की जांच और विदेशी मुद्रा उल्लंघनों को रोकना था। समय के साथ इसकी शक्तियाँ बढ़ती गईं और यह एक प्रभावशाली एजेंसी बनकर उभरी। परंतु विडंबना यह है कि बढ़ती शक्ति के साथ-साथ उस पर राजनीतिक दुरुपयोग के आरोप भी गहराते गए।

ईडी की निष्पक्षता पर सवाल

पिछले कुछ वर्षों में विशेषकर तब से जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार सत्ता में आई, ईडी की कार्यशैली को लेकर कई बार विपक्षी दलों ने आवाज उठाई है। आरोप यह हैं कि यह एजेंसी विपक्षी दलों के नेताओं के खिलाफ ज्यादा सक्रिय दिखाई देती है, जबकि सत्ता पक्ष से जुड़े मामलों में उसकी कार्यवाही धीमी या नगण्य रहती है। यह असंतुलन लोकतंत्र में निष्पक्ष जांच की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

 

 

सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी जांच एजेंसी को संविधान के दायरे में रहकर कार्य करना चाहिए, न कि सत्ता पक्ष की इच्छाओं के अनुसार। न्यायालय ने चेतावनी दी कि अगर ईडी अपनी निष्पक्षता खोती है, तो वह एक स्वायत्त संस्था नहीं, बल्कि सरकार की कठपुतली बनकर रह जाएगी। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है, क्योंकि न्याय की प्रक्रिया में जनता का विश्वास ही उसकी वैधता को बनाये रखता है।

पिंजरे का तोता” की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

2013 में, कोयला घोटाले की जांच के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को “पिंजरे का तोता” कहकर उसकी स्वायत्तता पर सवाल उठाए थे। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पीठ ने की थी, जब यह सामने आया कि सीबीआई ने सरकार के निर्देश पर स्टेटस रिपोर्ट में बदलाव किए। इस टिप्पणी के बाद सीबीआई की कार्यप्रणाली और उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू हो गई थी।

आज एक दशक बाद, वही परिस्थिति प्रवर्तन निदेशालय के संदर्भ में दोहराई जा रही है। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने फिर एक बार यह संकेत दिया है कि जांच एजेंसियाँ यदि स्वतंत्र नहीं हैं, तो वे सत्ता का औजार बन जाती हैं, न कि लोकतंत्र का रक्षक।

आंकड़ों में राजनीतिक दुरुपयोग की झलक
2014 से 2022 के बीच ईडी ने जिन 121 प्रमुख राजनीतिक नेताओं की जांच की, उनमें से लगभग 95% नेता विपक्षी दलों से थे। इसके विपरीत यूपीए शासनकाल में यह आंकड़ा 54% था। यह अंतर बेहद बड़ा और चिंताजनक है। विपक्ष इस प्रवृत्ति को “वॉशिंग मशीन” मॉडल कहता है, जिसमें विपक्षी नेताओं पर ईडी या सीबीआई के छापे पड़ते हैं, लेकिन जैसे ही वे भाजपा में शामिल होते हैं, मामले ठंडे पड़ जाते हैं या बंद कर दिए जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर, रिपोर्ट्स के अनुसार 2014 के बाद से 25 ऐसे नेता जिन पर जांच चल रही थी, भाजपा में शामिल हुए, और उनमें से 23 नेताओं को राहत मिली। इनमें कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना, टीएमसी, टीडीपी जैसे कई दलों के नेता शामिल हैं। इस प्रवृत्ति से यह संदेह और गहराता है कि कहीं जांच एजेंसियाँ केवल राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल तो नहीं की जा रहीं।

न्यायपालिका की भूमिका और उसकी चेतावनी-

भारतीय न्यायपालिका को लोकतंत्र का संरक्षक माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से बार-बार यह स्पष्ट किया गया है कि जांच एजेंसियाँ संविधान के अधीन हैं, किसी पार्टी या सरकार के नहीं। हाल की टिप्पणी इस बात की पुनः पुष्टि करती है कि न्यायपालिका इस मुद्दे को लेकर गंभीर है। यदि यह चेतावनी भी अनसुनी कर दी गई, तो इससे न केवल संस्थागत असंतुलन पैदा होगा, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था को भी खतरा उत्पन्न होगा।

लोकतंत्र और संवैधानिक नैतिकता पर संकट–

लोकतंत्र सिर्फ चुनावों के आयोजन तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह शासन की पारदर्शिता, संस्थाओं की जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा से परिभाषित होता है। जब जांच एजेंसियाँ पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करती हैं, तो यह सीधे-सीधे नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर प्रभाव डालता है—जैसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति, निष्पक्ष न्याय की अपेक्षा और समानता का अधिकार। इससे संविधान की मूल आत्मा आहत होती है।

नागरिकों का विश्वास और उसकी अहमियत
लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ जनता का विश्वास है। यदि नागरिकों को यह अनुभव होने लगे कि जांच एजेंसियाँ निष्पक्ष नहीं हैं, तो वे न तो न्यायपालिका पर भरोसा करेंगे, न सरकार पर। इससे एक सामाजिक असंतुलन और राजनीतिक अविश्वास पैदा होता है, जो लोकतंत्र को अंदर से खोखला करता है।

समाधान: एजेंसियों की स्वतंत्रता

इस पूरे परिप्रेक्ष्य में सबसे जरूरी यह है कि ईडी, सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाए। उनके शीर्ष पदों पर नियुक्तियाँ स्वतंत्र आयोग के माध्यम से हों, न कि सरकार की सिफारिश पर । उनकी रिपोर्टिंग संसद को होनी चाहिए, न कि किसी मंत्रालय को। इसके अतिरिक्त, एजेंसियों के कार्यों की समय-समय पर न्यायिक समीक्षा आवश्यक होनी चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय की हालिया(वर्तमान) में चेतावनी शासनतंत्र के लिए एक स्पष्ट और गंभीर संदेश है कि विधिक संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वतंत्रता से कोई समझौता लोकतंत्र को अस्वीकार्य दिशा में ले जा सकता है। लोकतंत्र की रक्षा केवल मतपेटियों से नहीं, बल्कि निष्पक्ष संस्थाओं और जवाबदेह शासन प्रणाली से होती है। मात्र मतदान या मतपेटियां से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा नही होती है बल्कि समान न्याय निष्पक्ष संस्थाओं की जवाबदेही , शासन प्रणाली से होती है , यदि प्रवर्तन निदेशालय और अन्य जांच एजेंसियाँ स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रहीं, तो भारत का लोकतंत्र केवल नाम मात्र का रह जाएगा।

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