HomeTrendingनागरिकता के दस्तावेजों पर इतना भ्रम ठीक नही

नागरिकता के दस्तावेजों पर इतना भ्रम ठीक नही

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उमेश चतुवेर्दी पिछले कुछ वर्षों में पासपोर्ट हासिल करना आसान हो गया है। इसकी वजह तकनीकी क्रांति तो है ही, लेकिन सरकारी नीतियों ने भी आम आदमी के लिए पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया को आसान किया है। पासपोर्ट हासिल करने के कठिन दौर से लेकर आसानी से प्राप्त होने के मौजूदा दौर में, आम नागरिक इसे अपनी नागरिकता का एक वैध दस्तावेज मानता रहा है। लेकिन पासपोर्ट सेवा दिवस के मौके पर भारतीय विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के पासपोर्ट को लेकर दिए बयान ने विवाद खड़ा कर दिया है। इस अधिकारी के मुताबिक, भारतीय पासपोर्ट सिर्फ विदेश यात्रा के लिए एक दस्तावेज है, भारतीय नागरिकता का सबूत नहीं। जहां पासपोर्ट हासिल करने को चार धाम यात्रा जैसी उपलब्धि माना जाता रहा हो, जहां किसी व्यक्ति की पहचान के लिए मजबूत सरकारी दस्तावेज माना जाता रहा हो, वहां ऐसा बयान आएगा तो विवाद होगा ही। तो विवाद हो रहा है। विशेष रूप से सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि अगर आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पैन कार्ड और पासपोर्ट नागरिकता का वैध दस्तावेज नही है तो फिर कोई भारतीय नागरिक अपनी नागरिकता के लिए क्या सबूत पेश करे।

भारतीय पासपोर्ट अधिनियम के शब्दों से गुजरें तो विदेश मंत्रालय के अधिकारी का कहना गलत भी नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में मतदाता सूचियों के विशेष और गहन परीक्षण के दौरान जब घोषित कर दिया गया कि किसी व्यक्ति के पास आधार कार्ड, पैन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र होना उसकी नागरिकता के सबूत नहीं है और अब पासपोर्ट भी नहीं रहा, तो फिर भारतीय नागरिक क्या करे। जरूरत पड़ने पर वह कैसे साबित करे कि वह भारतीय नागरिक है। इस आधार पर तो देश के ज्यादातर लोग अपनी नागरिकता को तो साबित ही नहीं कर पाएंगे। यही वजह है कि लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। आज के दौर की तमाम लड़ाइयों का बुनियादी और मजबूत आधार चूंकि नैरेटिव बन गया है तो यह भी साबित करने की कोशिश होगी कि मोदी सरकार ने जानबूझकर ऐसा किया है। इसके लपेटे में मोदी समर्थक ताकतें भी आएंगी, भारतीय जनता पार्टी पर तो खैर सवाल उठेगा ही। इस नैरेटिव को खड़ा होने से पहले ही जरूरी है कि नागरिकता के वैध दस्तावेज को लेकर जारी भ्रम को जल्द से जल्द दूर किया जाए। अन्यथा भ्रम का यह कुहासा जितना फैलेगा, वह आम नागरिक के मन में व्यवस्था के प्रति गुस्सा और क्षोभ भरेगा। इससे तनाव बढ़ाने वाली ताकतों को भी मौका मिलेगा।

पासपोर्ट को लेकर विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने जो कहा है, वह गलत भी नहीं है। अपने देश में भारतीय पासपोर्ट अधिनियम 1967 के तहत जारी किया जाता है। जबकि भारत में नागरिकता की व्याख्या और प्रमाणिकता के लिए भारतीय नागरिकता कानून 1955 है। पासपोर्ट एक्ट की धारा 20 के मुताबिक, अगर केंद्र सरकार चाहे तो किसी ऐसे व्यक्ति को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है जो भारत का नागरिक नहीं है। बस शर्त यह होगी कि सरकार को ऐसा लगे कि उसके लिए पासपोर्ट जारी करना व्यापक जनहित में जरूरी है। इस कानून से साफ है कि पासपोर्ट और नागरिकता दो अलग अलग चीजें हैं। बेशक भारतीय पासपोर्ट सिर्फ भारतीयों को ही मिलता है, लेकिन यह पत्थर की लकीर जैसा नियम नहीं है। पासपोर्ट अधिनियम की धारा 20 भारत सरकार को छूट देती है कि व्यापक जनहित में वह भारतीय नागरिक ना होने के बावजूद किसी व्यक्ति को पासपोर्ट जारी कर सकती है।

विदेश मंत्रालय के अधिकारी के बयान पर भले ही विवाद खड़ा हुआ हो, लेकिन पासपोर्ट के जरिए नागरिकता प्रमाणित करने के तीन अभियुक्तों समेत चार लोगों के दावे को बांबे हाईकोर्ट 2013 में ही खारिज कर चुका है। उन्होंने अपनी नागरिकता के लिए पासपोर्ट पेश किया था। बांबे हाईकोर्ट ने दो सितंबर 2013 के अपने फैसले में साफ कर दिया था कि अगर आपका जन्म 1987 के बाद हुआ है तो पासपोर्ट को अपनी नागरिकता के प्रमाण पत्र के रूप में नहीं पेश कर सकते। वैसे आधार कार्ड का कानून भी मानता है कि आधार कार्ड सिर्फ निवास और पहचान का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। आधार कानून 2016 की धारा में साफ लिखा है कि आधार कार्ड से नागरिकता की बजाय सिर्फ निवास स्थान और पहचान प्रमाणित होता है। इसकी वजह यह है कि आधार कानून के तहत 182 दिनों तक भारत में लगातार रहने वाले व्यक्ति को सरकार चाहे तो आधार कार्ड जारी कर सकती है। इसी आधार पर सर्वोच्च न्यायालय भी इसे नागरिकता का प्रमाण मानने से इनकार कर चुका है। इसी तरह पैन कार्ड के लिए भी व्यवस्था दी गई है। पैन कार्ड का कानूनी आधार है कि व्यक्ति अर्जन कर रहा है और टैक्स दे रहा है।
आधुनिक विश्व व्यवस्था की एक खामी यह है कि यहां कानून की भाषा अलग होती है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि कानूनी भाषा जटिल होती है और उसके शब्द जाल को आम आदमी नहीं समझ पाता। इसी आधार पर उसकी अवधारणाएं विकसित होती हैं और फिर वह किसी विषय का व्यवस्था को लेकर अपनी राय बनाता है। प्रधानमंत्री मोदी को इन जटिलताओं की समझ है, शायद यही वजह है कि उनके कार्यकाल में देश के सैकड़ों गैरजरूरी कानूनों को या तो रद्द किया गया है या फिर कुछ नए संदर्भों वाले कानूनों में समाहित कर दिया गया है। आज के दौर में नागरिकता के दस्तावेज के रूप जब पासपोर्ट, आधार कार्ड , पैन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र को आखिरी और अंतिम प्रमाण मानने से इनकार किया जाता है तो अपनी लोक और आम धारणा के चलते आम आदमी इसके विरोध में उतर आता है। यही वजह है कि जब मतदाता सूचियों के विशेष गहन परीक्षण यानी एसआईआर के दौरान इन दस्तावेजों को आखिरी दस्तावेज मानने से इनकार किया गया तो इसका विरोध शुरू हुआ था। कुछ इसी अंदाज में पासपोर्ट पर विदेश मंत्रालय के अधिकारी के बयान पर भी विवाद शुरू हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने पूछ लिया है कि पासपोर्ट बनाने से पहले पुलिस जब व्यक्ति का सत्यापन करती है तो आखिर वह किसका सत्यापन करती है और क्यों करती है? उनका यहां तक कहना है कि इससे लोगों के मन में यह भी संदेह उत्पन्न हो सकता है कि गैर भारतीयों को भी पासपोर्ट दिए जा रहे हैं?

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भारत सरकार की ओर से नगारकिता के प्रमाण को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर जब पासपोर्ट मान्य नहीं, मतदाता पहचान पत्र और आधार कार्ड पर भरोसा नहीं और पैन कार्ड मान्य नहीं तो फिर आम नागरिक अपनी नागरिकता को कैसे साबित करे। निश्चित तौर पर इसका भी सरकारी व्यवस्था में है। 20 दिसंबर, 2019 को राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी से जुड़े एक सवाल के जवाब में भारत सरकार के प्रवक्ता ने कहा था, ‘जन्म की तारीख और जन्म-स्थान से जुड़े कोई भी दस्तावेज जमा करके नागरिकता साबित की जा सकती है। हालांकि, ऐसे स्वीकार्य दस्तावेजों पर अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है।’ इसमें रिलीज में कहा गया था कि जन्म की तारीख और जन्म स्थान से जुड़े कोई भी दस्तावेज जमा करके नागरिकता साबित की जा सकती है। हालांकि, इन दस्तावेजों के बारे में आखिरी रूप से अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है। इसमें वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आधार, लाइसेंस, इंश्योरेंस के कागजात, जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र, जमीन या घर से जुड़े दस्तावेज या सरकारी अधिकारियों द्वारा जारी किए गए ऐसे ही अन्य दस्तावेज शामिल हो सकते हैं। इस लिस्ट में और भी दस्तावेज शामिल किए जा सकते हैं ताकि किसी भी भारतीय नागरिक को बेवजह परेशानी न हो।

बेशक कानून की भाषा अलग होती है और लोक का शब्द संसार अलग, लेकिन दोनों के बीच संतुलन होना ही चाहिए। लोक की समझ अपने तंत्र के लिए बेहतर बनी रहे, इसके लिए जरूरी है कि लोक और कानून की भाषा के बीच के अंतर को पाट लिया जाए। अन्यथा गलतफहमियां होती रहेंगी और आखिरकार इससे नुकसान लोकतंत्र का होगा।

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