सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी बंद कमरे या चारदीवारी के भीतर की गई कथित जातिवादी टिप्पणी को सार्वजनिक दृश्य में किया गया अपराध नहीं माना जा सकता। इसके अलावा अभियोजन पक्ष प्रथम दृष्टया भी यह साबित नहीं कर सका कि घटना ऐसी जगह पर हुई थी जहां लोग इसे देख या सुन सकते थे। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए एक स्कूल प्रबंधक के खिलाफ एससी/एसटी, 1989 के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूल प्रबंधक के खिलाफ कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद यह अपील सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
पूरा मामला छात्रों के आपसी विवाद से जुड़ा था. शिकायतकर्ता के दो बेटे संबंधित स्कूल में पढ़ते थे। विवाद के बाद शिकायतकर्ता स्कूल पहुंचा, जहां आरोप के अनुसार प्रबंधक और कर्मचारियों ने उसके साथ मारपीट की और जातिसूचक गालियां दीं। वहीं स्कूल प्रबंधक की पत्नी ने भी शिकायतकर्ता के खिलाफ क्रॉस एफआईआर दर्ज कराई थी।
इसके बाद, प्रबंधक ने हस्तक्षेप किया और उन पर भी हमला किया गया। इस एफआईआर में भी स्थानीय अदालत ने आरोप पत्र स्वीकार कर स्कूल प्रबंधक के खिलाफ समन जारी किया। प्रबंधक ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया था कि केवल प्रतिशोध की भावना का आरोप लगाकर कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती और प्रथम दृष्टया मामला बनता दिखता है।
इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने कानून के तकनीकी और कानूनी पहलुओं की बारीकी से समीक्षा की। एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(१) और 3(1)(२) का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि इस तरह के अपराध के लिए यह जरूरी है कि अपमानजनक टिप्पणी सार्वजनिक दृश्य के भीतर की गई हो। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसलों का हवाला देते हुए समझाया कि सार्वजनिक दृश्य का मतलब ऐसी जगह से है जहां आम जनता मौजूद हो और आरोपी द्वारा कहे गए शब्दों को सुन या देख सके। इसके उलट, किसी बंद कमरे में हुई घटना, जहां बाहर का कोई व्यक्ति मौजूद नहीं था, वह इस श्रेणी में नहीं आती।