प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट में मजिस्ट्रेटी पावर के खुलेआम दुरुपयोग पर नाराजगी व्यक्त करते हुए आठ दिन की गैर-कानूनी हिरासत पर दो लाख रुपये का हजार्ना ठोंका है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ तथा न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने प्रयागराज में खीरी निवासी मंसूर अहमद उर्फ लल्लू की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई करते हुए कहा है कि कमिश्नरेट सिस्टम में मजिस्ट्रेटी पावर मिलने के बाद उसका गलत इस्तेमाल बढ़ गया है। आम लोगों की आजादी से खिलवाड़ किया जा रहा है।
याची को 19 मार्च की रात 12:50 बजे खीरी थाने की पुलिस बिना कोई कारण बताए घर से उठाकर ले गई। पत्नी ने जब गिरफ्तारी का कारण पूछा तो पुलिस वालों ने उसे धक्का देकर हटा दिया। याची के बेटे शाहरुख खान ने मुख्यमंत्री पोर्टल पर वकील के जरिए शिकायत दर्ज कराई। चार दिन बाद 23 मार्च को जब याचिका दायर हुई तब पता चला कि याची को एसीपी बारा के सामने पेश करके जेल भेज दिया गया था। राज्य सरकार की तरफ से कहा गया कि याची ने गांव में लोगों को गाली दी थी, जिससे अशांति फैलने का डर था। पुलिस ने रोकने की कोशिश की तो हिंसा शुरू कर दी। इसलिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 170, 126 और 135 के तहत हिरासत में लिया गया। याची 19 मार्च को एसीपी के सामने जमानत नहीं दे पाया, इसलिए उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। उसने 27 मार्च को निजी मुचलका दिया, तब जाकर रिहा हुआ। गिरफ्तारी के कागज में कारण नहीं लिखा था। कोर्ट ने पूरे मामले को गंभीरता से लिया। माना कि याची को आठ दिन तक गैर-कानूनी न्यायिक हिरासत में रखा गया।
इसे आजादी का उल्लंघन मानते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि पीड़ित को 25 हजार रुपये प्रति दिन के हिसाब से कुल दो लाख रुपये का हजार्ना छह सप्ताह में दिया जाए। बाद में यह रकम एसीपी बारा के वेतन से वसूली जाएगी।
एसीपी के खिलाफ तीन महीने के अंदर विभागीय जांच पूरी करने का भी निर्देश दिया गया है। प्रकरण की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने गाजियाबाद कमिश्नरेट के पुराने मामले का हवाला भी दिया, जहां पुलिस कमिश्नर द्वारा पावर के दुरुपयोग की बात सामने आई थी।
कोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) प्रयागराज की उस रिपोर्ट को चौंकाने वाला माना जिसमें यह बात है कि वर्ष 2024 में 283, 2025 में 1,321 और 2026 में अब तक 721 लोगों को एक सप्ताह से लेकर 20 दिन तक जेल में रखा गया है।कोर्ट ने कहा- आंकड़े बताते हैं कि हिरासत को सजा की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। पुलिस आयुक्त को कोर्ट ने आदेश दिया है कि वह फैसले का पालन कर 14 सितंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट पेश करें। अगर आदेश का पालन नहीं हुआ तो उनको अगली तारीख पर खुद कोर्ट में उपस्थित होना पड़ेगा।