नई दिल्ली। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को अनुमति नहीं दी जा सकती। कर्नाटक हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए सिटी कॉपोर्रेशन के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें मल्लेश्वरम ब्राह्मण सभा को अपने एक आॅडिटोरियम में शंकराचार्य जयंती मनाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था।

बेंगलुरु वेस्ट कॉपोर्रेशन ने कहा था कि आॅडिटोरियम का इस्तेमाल धार्मिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह योग और उससे जुड़े कार्यक्रमों के लिए बनाया गया था।
यह कहते हुए कि शंकराचार्य जयंती न केवल धार्मिक, बल्कि एक सांस्कृतिक गतिविधि भी है, जस्टिस एमआई अरुण ने कहा, ‘जिस पर रोक नहीं है, उसकी अनुमति है।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि सरकार आॅडिटोरियम में कई गतिविधियों की अनुमति देती है और उनकी अर्जी खारिद करने का कोई ठोस आधार नहीं था। कॉपोर्रेशन ने कहा कि आॅडिटोरियम आमतौर पर धार्मिक और राजनीतिक गतिविधियों के लिए नहीं दिया जाता है।
जस्टिस अरुण ने कहा कि कॉपोर्रेशन ऐसे कोई दिशानिर्देश या नियम पेश नहीं कर पाया, जिनमें यह बताया गया हो कि आॅडिटोरियम का इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा शंकराचार्य सबसे सम्मानित आचार्यों में से एक हैं और उनका अद्वैत दर्शन देश के प्रमुख दार्शनिक परंपाराओं में से एक है। श्री शंकराचार्य जयंती को धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों ही माना जाना चाहिए।
भारतीय सभ्यता की महानता उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी है और इसे हटाना देश की आत्मा को निकालने जैसा होगा। हाई कोर्ट ने कहा भारतीय संस्कृति का उत्सव, जो धर्म से जुड़ा हुआ है, उसे कभी भी अवैध या असंवैधानिक नहीं माना जा सकता।

