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Tuesday, February 3, 2026
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HomeEducation Newsआधुनिकता की दौड़ में अपनी भाषाओं से दूर हो रही युवा पीढी

आधुनिकता की दौड़ में अपनी भाषाओं से दूर हो रही युवा पीढी

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  • सीसीएसयू में भाषाएं और लिपियों पर संगोष्ठी।

शारदा रिपोर्टर मेरठ। हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ द्वारा भारतीय भाषा दिवस 2024 के अवसर पर भारतीय भाषाएं और लिपियां विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर संगीता शुक्ला कुलपति चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ ने की। प्रोफेसर सोमा बंदोपाध्याय ने कहा कि भारतीय भाषाओं में विविधता है। मातृभाषा हमारे भाव की भाषा है।

वर्तमान पीढ़ी आधुनिकता की दौड़ में अपनी भाषाओं से दूर हो रही है इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम नवीन पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ें। प्रोफेसर वी. रा. जगन्नाथन ने कहा कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी पाठ्यक्रम में एकरूपता होनी चाहिए. भारत में तीन आर्य भाषाएं हैं हिंदी, उर्दू और बंगाली। हमें अपनी शक्ति को पहचानना चाहिए। हम अपने ही देश की क्षेत्रीय भाषाओं को दृढ़ नहीं कर पा रहे हैं। भारत के बहुभाषी समाज को आदर की दृष्टि से देखना चाहिए। हिंदी भारत को एक सूत्र में पिरोने का कार्य कर सकती है। प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी ने कहा कि भारत में भाषाई विविधताओं के साथ-साथ लिपियां की विशेषताओं का भी बड़ा क्षेत्र है।

लिपियों के क्षेत्र में विचार विमर्श किया जाना चाहिए। दक्षिण भारतीय लिपियों को समझने से कई दक्षिण भारतीय भाषाओं में पुन: शोध कार्य की पर्याप्त संभावनाएं हैं। प्रोफेसर के. के. सिंह ने कहा की भारतीय भाषाओं के संदर्भ में अंग्रेजी का वर्चस्व आज चिंता का विषय है. हम किसी भी स्तर पर अंग्रेजी वर्चस्व को कम नहीं कर पा रहे हैं. लार्ड मैकाले की दी हुई शिक्षा व्यवस्था से हम आज भी उबर नहीं पाए हैं हमें हिंदी के बुनियादी ज्ञान के स्तर को मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि नवीन पीढ़ी भारतीय संस्कृति और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सकें।

प्रोफेसर असलम जमशेदपुर ने कहा कि कोई भी देश अपनी तरक्की के लिए भाषाई तरक्की पर आश्रित होता है। हिंदी का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। प्रेमचंद ने भी अपने साहित्य लेखन की शुरूआत हिंदी से ही की। भारत में भाषाओं का मिश्रण है। प्रोफेसर वाचस्पति मिश्र ने कहा कि आर्थिक विकास भी भाषाई विकास पर आधारित है। भारतीय भाषा दिवस हमें हमारी भाषाओं को उन्नत करने के संकल्प की याद दिलाता है। विज्ञान में हम अपनी भाषाओं में अनुसंधान नहीं कर पा रहे हैं।

 

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