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मुजफ्फरनगर दंगों में 12 साल बाद फैसला: लिसाढ़ कांड में नामजद ग्यारह आरोपी कोर्ट से बरी

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– 12 साल में 100 से ज्यादा तारीखें।


शारदा रिपोर्टर

मेरठ। 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान लिसाढ़ गांव में हुई लूट और आगजनी के चर्चित मामले में अदालत ने 11 आरोपियों को बरी कर दिया है। फास्ट ट्रैक कोर्ट ने साक्ष्य के अभाव और प्रमुख गवाहों के बयान से पलट जाने के आधार पर यह फैसला सुनाया।

यह मामला 8 सितंबर 2013 को हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान शामली जिले के थाना फुगाना क्षेत्र स्थित लिसाढ़ गांव का है। इस दौरान वादी उमरदीन ने 13 दिन बाद पुलिस में मुकदमा दर्ज कराया था।

वादिनी उमरदीन का आरोप था कि सुबह करीब 10 बजे एक उग्र भीड़ ने उनके घर पर हमला किया, घर के अंदर घुसकर 3.5 तोला सोना, ढाई किलो चांदी और 1.80 लाख रुपये नकद लूट लिए। इसके अलावा करीब साढ़े सात लाख रुपये का अन्य सामान भी लूट कर ले जाया गया। आरोपियों ने घर में आग भी लगा दी थी। दहशत के कारण उमरदीन अपना परिवार लेकर झिंझाना स्थित अपने भाई के घर चले गए थे।

इस मामले में एसआईसी के विवेचक पंकज कुमार त्रिपाठी ने फरवरी 2015 में दो अलग-अलग चार्जशीट दाखिल कीं।जिनमें सुभाष, पप्पन, मनवीर, विनोद, प्रमोद, नरेंद्र, रामकिशन, रामकुमार, मोहित, विजय और राजेंद्र को आरोपी बनाया गया। मुकदमे की सुनवाई पहले अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट संख्या-1 में चली, बाद में यह 26 जुलाई 2022 को सत्र न्यायालय को सौंप दिया गया।

गवाहों के बयान बदलने से अभियोजन पक्ष को झटका: मुकदमे की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि वादी उमरदीन और उनके पुत्र जियाउल हक ने न्यायालय में बयान देने से इनकार कर दिया। दोनों को कोर्ट ने पक्षद्रोही घोषित कर दिया। वहीं, तीसरी अहम गवाह उमरदीन की पत्नी बाला की गवाही से पहले ही मृत्यु हो गई। इस कारण अभियोजन पक्ष मजबूत साक्ष्य पेश नहीं कर पाया और अंतत: अदालत ने सभी 11 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया।

68 बार कोर्ट गया, मानसिक तनाव झेला: आरोपी मनवीर

आरोपित मनवीर ने बताया कि मेरा नाम झूठे आरोप में लिखवा दिया गया था। मैं लगातार मानसिक दबाव में रहा। सत्र न्यायालय में 68 से अधिक बार पेश हुआ। उसे और बाकी आरोपियों को राहत तो मिली है, लेकिन 12 साल की कानूनी लड़ाई ने उनके जीवन को झकझोर कर रख दिया।

कोर्ट ने क्या कहा?

फास्ट ट्रैक कोर्ट ने कहा कि वादिनी और गवाहों के बयान न आने व साक्ष्य की कमी के चलते अभियोजन आरोप सिद्ध नहीं कर सका। ऐसे में आरोपियों को दोषी करार नहीं दिया जा सकता।

पृष्ठभूमि: 2013 दंगे और लिसाढ़ गांव

सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर और शामली जिलों में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी, जिसमें 60 से अधिक लोग मारे गए थे और हजारों लोग बेघर हुए थे। लिसाढ़, फुगाना, कुटबा, कुटबी जैसे गांव इस हिंसा की मुख्य चपेट में आए थे। लिसाढ़ कांड उसी श्रृंखला का हिस्सा था, जिसे लेकर कई मुकदमे दर्ज हुए थे। यह केस उन मामलों में से एक था जो 12 साल तक अदालतों में चला।

 

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