150 वर्ग किमी का नक्शा बना रही सरकार
हरिद्वार। अगले साल हरिद्वार में होने वाले कुंभ मेले में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए उत्तराखंड सरकार इस बार भीड़ प्रबंधन को सिर्फ पुलिस और प्रशासन के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती।
इसके लिए डिजिटल कुंभ का कॉन्सेप्ट तैयार किया जा रहा है। इसमें कुंभ क्षेत्र का डिजिटल नक्शा तैयार करने से लेकर श्रद्धालुओं को रूट, घाट, पार्किंग और प्रवेश-निकास की जानकारी देने तक की व्यवस्था एक डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की तैयारी है।
इस पूरी योजना पर सूचना प्रौद्योगिकी विकास प्राधिकरण और उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकास्ट) मिलकर काम कर रहे हैं। यूकास्ट को कुंभ क्षेत्र की मैपिंग की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि वेबसाइट और जरूरी मोबाइल एप्लीकेशन विकसित करेगा।
यूकास्ट करीब 150 वर्ग किलोमीटर के कुंभ क्षेत्र की ॠकर आधारित मैपिंग कर रहा है। इसमें घाट, पार्किंग स्थल, प्रमुख मार्ग, प्रवेश और निकास बिंदु समेत ऐसे सभी स्थानों का डिजिटल डाटा तैयार किया जा रहा है, जो मेले के दौरान श्रद्धालुओं की आवाजाही और भीड़ प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
इस मैपिंग का मकसद सिर्फ कुंभ क्षेत्र का नक्शा तैयार करना नहीं है। डिजिटल डाटा को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर प्रशासन यह समझ सके कि किसी स्थान तक पहुंचने के लिए कौन सा रास्ता बेहतर है और भीड़ बढ़ने की स्थिति में श्रद्धालुओं को किस वैकल्पिक मार्ग से भेजा जा सकता है।
यूकास्ट की सीनियर वैज्ञानिक डॉ. सुषमा गैरोला के मुताबिक कुंभ क्षेत्र को 32 सेक्टरों में बांटकर ॠकर मैपिंग का काम किया जा रहा है। प्रत्येक सेक्टर से संबंधित प्रमुख लोकेशन और सुविधाओं का डिजिटल डाटा तैयार किया जा रहा है।
इससे कुंभ के दौरान प्रशासन के पास पूरे मेला क्षेत्र का एक डिजिटल विजुअल उपलब्ध होगा। किसी घाट, पार्किंग या मार्ग पर दबाव बढ़ने की स्थिति में संबंधित क्षेत्र की पहचान और वहां तक पहुंचने वाले रास्तों को समझना आसान होगा।
डिजिटल कुंभ का सबसे बड़ा फायदा सीधे श्रद्धालुओं को देने की तैयारी है। विकसित किए जाने वाले वेबसाइट और एप्लीकेशन में कुंभ से जुड़ी जरूरी जानकारी एक जगह उपलब्ध कराने का प्लान है।
मसलन, किस घाट पर कैसे पहुंचना है। नजदीकी पार्किंग कहां है। प्रवेश और निकास के निर्धारित रास्ते कौन से हैं। किसी क्षेत्र में भीड़ ज्यादा होने पर वैकल्पिक मार्ग कौन सा है। प्रमुख स्थलों की लोकेशन और दूरी कितनी है। यानी श्रद्धालुओं को हर जानकारी के लिए अलग-अलग जगह पूछताछ करने की जरूरत कम होगी और प्रशासन भीड़ को जरूरत के हिसाब से अलग-अलग रूट पर डायवर्ट कर सकेगा।