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आदेश सुरक्षित रखने के तीन महीने के अंदर फैसला सुनाएं, सुप्रीम कोर्ट का सभी हाई कोर्ट को निर्देश

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नई दिल्ली। भारत की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को सुनाने में देरी को रोकने के लिए देश की सभी हाई कोर्ट को बाध्यकारी निर्देश जारी कर दिया है। जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया है और इस बड़े निर्देश को जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले को सुनाते हुए कई अहम टिप्पणी की है।

 

 

सामने आई जानकारी के अनुसार, भारत के सीजेआई सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सभी हाई कोर्ट को तीन महीने के भीतर लंबित फैसला सुनाने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि जमानत आदेश उसी दिन या फैसले होने पर अगले दिन सुनाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को नियमित जमानत आदेशों की तत्काल सूचना देने का भी निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि जमानत प्राप्त विचाराधीन कैदियों को औपचारिकताओं के अधीन उसी दिन रिहा किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि सभी निर्णय सुनाए जाने के 24 घंटे के भीतर हाई कोर्ट की वेबसाइटों पर भी अपलोड किए जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में आगे कहा कि निर्णय के मुख्य भाग के सुनाए जाने की तिथि को ही फैसला सुनाए जाने की तिथि माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस अहम आदेश में कहा है कि हाई कोर्ट प्राथमिक संस्थाएं हैं जहां हजारों लोग न्याय पाने के लिए आते हैं और समय पर निर्णय सुनाना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी साफ कर दिया है कि ये निर्देश किसी भी जज या संस्था पर लांछन लगाने के उद्देश्य से नहीं हैं।

संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर फैसले का सिर्फ मुख्य हिस्सा (आॅपरेटिव हिस्सा) सुनाया जाता है, तो फैसले का पूरा विवरण (तर्क सहित) 15 दिनों के भीतर वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर फैसला सुरक्षित रखने के चार महीने के भीतर फैसला नहीं सुनाया जाता है, तो संबंधित पक्ष हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से संपर्क कर सकते हैं, ताकि मामले को किसी दूसरी बेंच को सौंपा जा सके।

बेंच ने आगे कहा कि जब किसी फैसले का पूरा विवरण (तर्क सहित) खुली अदालत में सुनाया जाता है, तो उस फैसले को 24 घंटे के भीतर वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके द्वारा जारी किए गए इन निदेर्शों का मकसद किसी खास जज या हाई कोर्ट के किसी फैसले पर कोई सवाल उठाना नहीं है।

 

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