HomeTrendingसुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: "अवैध है तो हटेगा"

सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: “अवैध है तो हटेगा”

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EWS को भी नहीं राहत, 44 सील भवनों पर होगी ध्वस्तीकरण की कार्यवाही।


नई दिल्ली/मेरठ। आवास विकास परिषद के क्षेत्रों में अवैध निर्माण और आवासीय भवनों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आज की हियरिंग में बेहद सख्त रुख अपनाया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “जो भी अनधिकृत है, उसे कंपाउंड नहीं किया जा सकता। उसे हटाना ही होगा।” कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के मकानों को भी केवल इस आधार पर कोई विशेष राहत नहीं दी जाएगी।

परिषद ने अदालत से आग्रह किया कि 328 EWS मकानों में 1 से 3 मीटर तक के छोटे निर्माण को 1982 के नियमों के तहत कंपाउंड करने की अनुमति दी जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया।
“There is no question of compounding”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई निर्माण मास्टर प्लान और स्वीकृत नक्शे के अनुरूप नहीं है, तो उसके कंपाउंडिंग का सवाल ही नहीं उठता। अदालत ने दो टूक कहा कि अवैध निर्माण को किसी भी परिस्थिति में वैध नहीं बनाया जा सकता।

अदालत ने कहा कि EWS होने का अर्थ यह नहीं कि कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार मिल जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह व्यक्तिगत मामलों में नहीं जाएगी और किसी श्रेणी के लिए अलग नियम नहीं बनाएगी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि आवासीय क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर, बैंक या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां नियमों के विरुद्ध हैं। यदि कोई व्यवसाय करना चाहता है तो उसे वैध व्यावसायिक परिसर में किया जाए, न कि आवासीय भवन में।

डायग्नोस्टिक सेंटर पर अदालत की सख्त टिप्पणी
एक मामले में जब वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल के पास मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) का प्रमाणपत्र है और वह अस्पताल नहीं बल्कि डायग्नोस्टिक सेंटर चला रहे हैं, तो सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताई।

अदालत ने पूछा कि संबंधित CMO का नाम क्या है और कहा कि उन्हें तलब किया जाएगा। कोर्ट ने सवाल उठाया कि डायग्नोस्टिक सेंटर चलाने की अनुमति देने का अधिकार किसने दिया? साथ ही पूछा कि क्या डायग्नोस्टिक सेंटर व्यावसायिक गतिविधि नहीं माना जाएगा?
अदालत ने पूरे मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि एक शहर की स्थिति इतनी खराब है तो राज्य के अन्य हिस्सों का क्या हाल होगा।

 

अदालत ने आदेश दिया कि:
यदि पूरा भवन व्यावसायिक उपयोग में बदल चुका है तो पूरे भवन को ध्वस्त किया जा सकता है।
यदि केवल अतिरिक्त हिस्सा अवैध है तो 15 दिन का नोटिस दिया जाएगा।
मालिक स्वयं अवैध निर्माण हटाए, अन्यथा प्राधिकरण ध्वस्तीकरण करेगा।
ध्वस्तीकरण का पूरा खर्च भवन स्वामी से भू-राजस्व की तरह वसूला जाएगा।

एक अन्य मामले में अदालत ने पाया कि मूल स्वीकृति आवासीय भवन की थी, लेकिन बाद में वहां स्कूल संचालित किया जाने लगा।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ऐसा नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि स्कूल चलाना है तो उसे वैध संस्थागत परिसर में संचालित किया जाए और संबंधित व्यक्ति अदालत व प्रशासन के साथ सहयोग करे।

सुनवाई के दौरान कई पक्षों ने नगर के बायलॉज़ और स्थानीय नियमों का हवाला देकर राहत की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी सिरे से खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि बायलॉज़ का सहारा लेकर लोगों की जान से समझौता नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसके लिए मानव जीवन और सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि है।
आग की घटनाओं का भी किया उल्लेख
सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ और मालवीय नगर जैसी आग की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि अवैध निर्माण और संकरी जगहों पर किए गए अतिक्रमण लोगों की जान के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। इसलिए ऐसे मामलों में किसी प्रकार की नरमी उचित नहीं होगी।
पूरे शहर में होगी कार्रवाई
अदालत ने आवास विकास परिषद से पूछा कि कार्रवाई केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित क्यों है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरे शहर में जहां-जहां अवैध निर्माण हैं, उनकी पहचान कर समान रूप से कार्रवाई की जाए।
अदालत ने अधिकारियों से कहा कि वे आंखें बंद न रखें और अपने वैधानिक दायित्वों का पालन करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि चयनात्मक कार्रवाई से भेदभाव के आरोप लगेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि:
पूरे शहर में व्यापक निरीक्षण किया जाए।
सभी अवैध निर्माणों की पहचान कर कार्रवाई जारी रखी जाए।
सेटबैक में हुए सभी अतिक्रमण हटाए जाएं।
अगली सुनवाई तक नई प्रगति रिपोर्ट अदालत में दाखिल की जाए।
सुनवाई का सबसे बड़ा संदेश
इस सुनवाई ने स्पष्ट कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट अब अवैध निर्माणों के मामले में किसी भी प्रकार की रियायत देने के पक्ष में नहीं है। चाहे मामला EWS मकानों का हो, स्कूल का, अस्पताल का, डायग्नोस्टिक सेंटर का या किसी अन्य व्यावसायिक गतिविधि का—यदि निर्माण स्वीकृत नक्शे और मास्टर प्लान के विपरीत है, तो उसे हटाना ही होगा।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि नियमों के विरुद्ध अनुमति देने में अधिकारियों की भूमिका पाई गई तो उन्हें भी जवाबदेह ठहराया जा सकता है। अब सभी की निगाहें अब सितंबर में होने वाली अगली सुनवाई पर हैं, जब आवास विकास परिषद को पूरे शहर में की गई कार्रवाई की ताज़ा अनुपालन रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश करनी होगी।

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