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Monday, January 12, 2026
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Homeउत्तर प्रदेशMeerutदिल्ली के लिए जुड़ा कुनबा, राज्यों में बजने लगे बर्तन

दिल्ली के लिए जुड़ा कुनबा, राज्यों में बजने लगे बर्तन

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  • आईएनडीआईए से जुड़ी पार्टी कांग्रेस और सपा में शुरू हुआ विवाद।
  • एक दूसरे की औकात बताने लगे दोनों पार्टियों के नेता।
  • भाजपा गठबंधन में शुरू होने लगी दबाव की राजनीति।

अनुज मित्तल, समाचार संपादक |

मेरठ। लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर भाजपा और विपक्ष ने अपने-अपने गठबंधन तैयार किए हैं। बसपा सहित इक्का दुक्का क्षेत्रीय पार्टी ही हैं, जो गठबंधन से बाहर हैं। गठबंधन होने के बाद दोनों ही दलों एनडीए और आईएनडीआईए को लेकर कहा जा रहा था कि दोनों का गठबंधन टिकना आसान नहीं है, तो ऐसा ही नजर आना शुरू हो गया है।

फिलहाल मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव को लेकर जहां कांग्रेस और सपा में जुबानी जंग शुरू हो चुकी है, तो यूपी में भाजपा के सहयोगी दलों ने लोकसभा सीटों को लेकर अभी से दबाव बनाना शुरू कर दिया है।

   पहले बात करते हैं  सपा और कांग्रेस की। दोनों ही दल आईएनडीआईए में हैं और लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ने की बात कह चुके हैं। हालांकि यह गठबंधन लोकसभा चुनाव को लेकर हुआ है, लेकिन मध्यप्रदेश में सपा ने प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस के सामने मुश्किलें खड़ा कर दी हैं। जबकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस सपा के मुकाबले बहुत ज्यादा मजबूत है। ऐसे में कांग्रेस नेताओं ने सपा पर हल्ला बोल दिया है। जुबानी जंग इतनी तीखी हो गई है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कांग्रेस नेताओं को औकात से ज्यादा बोलने तक की बात कह डाली। वहीं कांग्रेस नेता कमलनाथ सहित अजय राय आदि ने सपा पर आरोप लगाया है कि वह मध्य प्रदेश में प्रत्याशी उतारकर भाजपा की मदद कर रही है।

यदि यह जुबानी जंग इसी तरह तेज रही और सपा के कारण मध्य प्रदेश में कांग्रेस को झटका लगा तो माना जा रहा है कि इसका असर लोकसभा चुनाव पर भी सीधे सीधे जाएगा।
वहीं दूसरी ओर भाजपा में भी सबकुछ ठीक नहीं है। यूपी में भाजपा का गठबंधन मुख्य रूप से अपना दल (एस), सुभासपा और निषाद पार्टी से है। पिछले चुनाव में भी भाजपा का अपना दल से गठबंधन था और दो सीटें भाजपा ने दी थी, जिसमें दोनों पर जीत हासिल हुई थी। अपना दल की अनुप्रिया पटेल इस बार लोकसभा में ज्यादा भागीदारी चाहती हैं। इसी कारण उन्होंने देश में जातीय जनगणना की मांग तेज कर दी है।

इनके अलावा सुभासपा के मुखिया ओमप्रकाश राजभर भी जातीय जनगणना की मांग कर रहे हैं। वह भी लोकसभा में दो सीट चाहते हैं। वहीं निषाद पार्टी के संजय निषाद इस बार अपने सिंबल पर चुनाव लड़ना चाहते हैं और वह इसके लिए कई बार सार्वजनिक रूप से बोल भी चुके हैं।

   इन तीनों नेताओं के अप्रत्यक्ष दबाव से भाजपा में बेचैनी है। क्योंकि भाजपा इस बार भी लोकसभा चुनाव में 78सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुकी है। इस बार भी वह मात्र दो ही सीट अनुप्रिया पटेल को देना चाहती है। वहीं संजय निषाद और ओमप्रकाश राजभर से वह लोकसभा में गठबंधन यूपी के विधानसभा चुनाव लड़वाने की शर्त पर ही रखना चाहती है।

  इसके पीछे भाजपा का मकसद भी साफ है। क्योंकि वह ओमप्रकाश राजभर और संजय निषाद पर ज्यादा विश्वास नहीं कर सकती है। ये दोनों कभी भी दल बदल सकते हैं। ऐसे में भाजपा ज्यादा से ज्यादा सीट अपनी रखते हुए सरकार बनने के बाद कोई भी खतरा मोल लेना नहीं चाहती है।

   इस बार चुनाव होगा निकटतम

भाजपा जानती है कि विपक्ष जिस तरह एकजुट है, उससे उसके सामने यह चुनाव बड़ी चुनौती होगा। लगभग हर सीट पर हार जीत का फैसला जहां बहुत निकटतम होगा, तो सरकार बनाने के लिए जरूरी सीटों की गिनती भी बहुत सीमित ही होंगी। ऐसे में सीमित विकल्पों के साथ भाजपा कोई रिस्क नहीं लेना चाहती है। हालांकि भाजपा यह भी नहीं चाहती कि उससे जुड़ने वाली कोई भी पार्टी विपक्षी खेमे से जुड़े। ऐसे में इस आने वाले संकट से निपटने के लिए भाजपा का शीर्ष नेतृत्व लगातार मंथन कर रहा है।

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