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लखनऊ: बुलडोजर से मस्जिद को ढहाया, हाईकोर्ट के आदेश पर हुई कार्रवाई

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  • तड़के चार बजे बुलडोजर से मस्जिद को ढहाया,
  • हाईकोर्ट के आदेश पर हुई कार्रवाई, 60 साल पहले खलियान की जमीन पर बनी थी।

लखनऊ। गुरुवार तड़के 4 बजे मस्जिद को बुलडोजर से ढहा दिया गया। मस्जिद सरकारी जमीन पर 60 साल पहले बनाई गई थी। तहसील स्तर के अफसर गुरुवार तड़के 3 बजे 3 बुलडोजर लेकर मौके पर पहुंचे। एक घंटे के अंदर मस्जिद को जमींदोज कर दिया। इसके बाद मलबा हटाया गया। इस दौरान पीएसी की 2 टुकड़ियों समेत भारी पुलिस बल तैनात रहा।

 

Lucknow bulldozer

 

मामला बख्शी का तालाब तहसील के ग्राम अस्ती स्थित गाटा संख्या 648 की जमीन से जुड़ा है। यहां खलिहान की 0.00300 हेक्टेयर जमीन पर मस्जिद का अवैध निर्माण किया गया था। इसे लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। प्रशासन ने 2025 में कब्जा हटाने और 36 हजार रुपए का जुमार्ने का आदेश दिया था।

इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। मस्जिद कमेटी ने निर्माण को वैध ठहराया, लेकिन जमीन पर अपना वैध अधिकार साबित नहीं कर पाए। कोर्ट ने तहसीलदार और अपर जिलाधिकारी (न्यायिक) के पहले के दिए आदेशों को सही ठहराया। इसके बाद प्रशासन ने कब्जा हटाने की कार्रवाई की।

रात में 3 बजे पुलिस और तहसील स्तर के अधिकारी 3 बुलडोजर लेकर पहुंचे। अधिकारियों के अनुसार, हाईकोर्ट के आदेश के बाद मस्जिद को हटाने का नोटिस इसकी दीवार पर चस्पा कर दिया गया था। इसके बाद दिए गए समय तक इंतजार किया गया। उसके बावजूद अवैध रूप से बनी संरचना नहीं हटी तो इसे प्रशासन ने हटवा दिया।

तहसील के आदेश को हाईकोर्ट ने सही माना

तहसीलदार शरद कुमार के अनुसार, अस्ती गांव के मोहम्मद साहिबान और लाल मोहम्मद को हाईकोर्ट के आदेश के बाद नोटिस दिया गया। इसमें बताया कि सरकारी खलिहान पर मस्जिद बनाई गई है। तहसील स्तर पर भी यही बताया गया था। इन्हें अवैध संरचना को वहां से हटाने और 36 हजार रुपए का जुमार्ना लगाया गया था। तब ये लोग आदेश न मानकर हाईकोर्ट पहुंचे। वहां से भी इन्हें राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने भी तहसील स्तर का आदेश बरकरार रखा और कहा कि नापजोख में कोई त्रुटि नहीं है। संरचना सरकारी जमीन पर ही बनी है। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह राहत दी कि 36 हजार रुपए का जुमार्ना माफ कर दिया।

करीब एक घंटे तक कार्रवाई चली

एडीएम प्रशासन राकेश सिंह के अनुसार, रात में एक्शन की जानकारी पर कब्जेदारों की ओर से विरोध करने की सूचना मिली। इस पर मौके पर जाकर एसडीएम के साथ निरीक्षण किया गया। जायजा लेने के बाद प्रशासन ने स्पष्ट चेतावनी दी कि अवैध कब्जा हर हाल में हटाया जाएगा। कानून व्यवस्था में किसी भी तरह की बाधा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके बाद रात 3 बजे पीएसी बल के साथ मौके पर पहुंचे। वहां जायजा लेते हुए 3 बुलडोजर लगा दिए गए। करीब 1 घंटे तक चली कार्रवाई में पूरी मस्जिद जमींदोज कर दी गई। इस कार्रवाई के दौरान किसी भी तरह की बाधा सामने नहीं आई। ग्राम समाज की जमान को कब्जे से मुक्त कर खाली करा दी गई है। अब वहां गांववाले फिर से खलिहान लगा सकेंगे।

प्रशासन ने कब्जा का आरोप लगाया था

प्रशासन का आरोप था कि इसी भूमि पर अवैध रूप से कब्जा कर मस्जिद का निर्माण कर लिया गया है। वहीं, कब्जा करने वालों का कहना था कि मस्जिद का निर्माण करीब 60 वर्ष पूर्व स्थानीय मुस्लिम समुदाय द्वारा किया गया था और यह कोई नया अतिक्रमण नहीं है। उन्होंने यह भी दलील दी कि वे सिर्फ नमाज पढ़ने के लिए वहां जाते हैं और मस्जिद के प्रबंधन से उनका कोई संबंध नहीं है। साथ ही कब्जेदारों ने सुनवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें गवाहों से जिरह का अवसर नहीं दिया गया।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यूपी राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत इस प्रकार के मामलों में कार्यवाही संक्षिप्त प्रक्रिया के द्वारा होती है, जिसमें शपथ पत्रों के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है। हर मामले में गवाहों की जिरह अनिवार्य नहीं है। न्यायालय ने पाया कि भूमि ग्राम सभा की है और कब्जेदार उस पर कोई वैध अधिकार, स्वामित्व या हित सिद्ध नहीं कर सके। इसी आधार पर बेदखली का आदेश सही माना गया।

हाईकोर्ट ने छह दिन पहले दिया था आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने ग्राम सभा की जमीन पर बनी मस्जिद से तहसीलदार के बेदखली के आदेश को सही मानते हुए उसे बरकरार रखा। न्यायालय ने कहा था कि न तो तहसीलदार के आदेश में और न ही अपर जिलाधिकारी द्वारा अपील खारिज किए जाने के आदेश में कोई गलती है।

हालांकि, न्यायालय ने याचियों पर लगा 36 हजार रुपए का जुमार्ना निरस्त कर दिया। कोर्ट ने पाया कि खलिहान के तौर पर दर्ज इस जमीन पर मस्जिद का निर्माण करने में याचियों की कोई भूमिका नहीं पाई गई। यह निर्णय न्यायमूर्ति आलोक माथुर की एकल पीठ ने शाहबान व अन्य की ओर से दाखिल याचिका पर पारित किया। याचियों ने तहसीलदार और अपर जिलाधिकारी (न्यायिक) के पारित आदेशों को चुनौती दी थी।

 

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