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Sunday, January 11, 2026
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ऐसा कोई लक्ष्य नहीं जो भारतीय पूरा न कर सकें, वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर बोले पीएम मोदी

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नई दिल्ली। पीएम मोदी ने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में एक साल तक मनाए जाने वाले स्मरणोत्सव की शुक्रवार को शुरूआत की। मोदी ने इस अवसर पर यहां इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में एक स्मारक डाक टिकट और सिक्का भी जारी किया।

यह कार्यक्रम सात नवंबर 2025 से सात नवंबर 2026 तक मनाए जाने वाले एक साल के राष्ट्रव्यापी स्मरणोत्सव की औपचारिक शुरूआत है। इस स्मरणोत्सव में उस कालजयी रचना के 150 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाया जाएगा जिसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरित किया और राष्ट्रीय गौरव एवं एकता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।

इस अवसर पर पीएम मोदी ने कहा वंदे मातरम, ये शब्द एक मंत्र है, एक ऊर्जा है, एक स्वप्न है, एक संकल्प है। वंदे मातरम, ये शब्द मां भारती की साधना है, मां भारती की आराधना है। वंदे मातरम, ये शब्द हमें इतिहास में ले जाता है, ये हमारे वर्तमान को नए आत्मविश्वास से भर देता है, और हमारे भविष्य को ये नया हौसला देता है कि ऐसा कोई संकल्प नहीं जिसकी सिद्धि न हो सके, ऐसा कोई लक्ष्य नहीं जिसे हम भारतवासी पा न सकें। पीएम मोदी ने कहा वंदे मातरम का सामूहिक गायन एक अवर्णनीय अनुभव है। इतने सारे स्वरों में – एक लय, एक स्वर, एक भाव, एक ही रोमांच और प्रवाह – ऐसी ऊर्जा, ऐसी लहर ने हृदय को झकझोर दिया है। वंदे मातरम के इस सामूहिक गान का यह अद्भुत अनुभव वाकई अभिव्यक्ति से परे है। 7 नवंबर 2025, का दिन बहुत ऐतिहासिक है।
आज हम वंदे मातरम के 150वें वर्ष का महाउत्सव मना रहे हैं। यह पुण्य अवसर हमें नई प्रेरणा देगा, कोटि कोटि देशवासियों को नई ऊर्जा से भर देगा। इस दिन को इतिहास की तारीख में अंकित करने के लिए आज वंदे मातरम पर एक विशेष सिक्का और डाक टिकट भी जारी किए गए हैं।

पीएम मोदी ने आगे कहा, मैं देश के लाखों महापुरुषों को, मां भारती की संतानों को, वंदे मातरम के लिए जीवन खपाने के लिए आज श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं और देशवासियों को हार्दिक बधाई देता हूं। गुलामी के उस कालखंड में ह्यवंदे मातरमह्ण इस संकल्प का उद्घोष बन गया था कि भारत की आजादी का, मां भारती के हाथों से गुलामी की बेड़ियां टूटेंगी! उसकी संतानें स्वयं अपने भाग्य की विधाता बनेंगी!

पीएम मोदी ने कहा, 1875 में, जब बंकिम बाबू ने बंग दर्शन में ह्यवंदे मातरम प्रकाशित किया था, तब कुछ लोगों को लगा था कि यह तो बस एक गीत है। लेकिन देखते ही देखते वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता संग्राम का स्वर बन गया। एक ऐसा स्वर, जो हर क्रांतिकारी की जुबान पर था, एक ऐसा स्वर, जो हर भारतीय की भावनाओं को व्यक्त कर रहा था! वंदे मातरम आजादी के परवानों का तराना होने के साथ ही इस बात की भी प्रेरणा देता है कि हमें इस आजादी की रक्षा कैसे करनी है। वंदे मातरम हर युग और हर काल में प्रासंगिक है। इसने अमरता प्राप्त कर ली है।

 

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