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समुदायों को बदनाम करना असंवैधानिक; घूसखोर पंडत के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी समुदाय को भाषण, मीम, कार्टून, फिल्म, विजुअल आर्ट या किसी भी माध्यम से बदनाम करना या नीचा दिखाना संविधान का उल्लंघन है. यह महत्वपूर्ण टिप्पणी नेटफ्लिक्स की फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ विवाद से जुड़े निर्णय में सामने आई है, जिसका विस्तृत फैसला आज अपलोड हुआ।

 

 

यह टिप्पणी उस मामले से जुड़ी है जहां कोर्ट ने पांच दिन पहले फिल्म के निमार्ताओं को उसका शीर्षक बदलने के लिए बाध्य किया था। जस्टिस उज्जल भुइयां ने जस्टिस बी.वी. नागरत्ना से अलग अपने सहमतिपूर्ण फैसले में संवैधानिक मूल्यों और भाईचारे के महत्व पर विस्तृत विचार रखा।

जस्टिस भुइयां ने कहा, ‘राज्य हो या गैर‑राज्य पक्ष, किसी भी माध्यम से किसी समुदाय को बदनाम करना असंवैधानिक है। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र या किसी पहचान के आधार पर एक समूह को निशाना बनाना संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है। विशेष रूप से वे सार्वजनिक पदाधिकारी, जिन्होंने संविधान की रक्षा की शपथ ली है, उन्हें ऐसी टिप्पणियों से सख्ती से बचना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भले ही फिल्म निमार्ताओं ने विवादित शीर्षक वापस ले लिया हो, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द से जुड़े संवैधानिक मूल्यों को स्पष्ट करना जरूरी था, ताकि भविष्य में कोई भ्रम न रहे।

हालिया विवादों के चलते कोर्ट की अहम टिप्पणी

यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के भाषणों को लेकर देशभर में बहस चल रही थी. इससे पहले, मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरमा के खिलाफ घृणा भाषण के आरोपों पर एफआईआर दर्ज कराने की याचिका सुनने से इनकार करते हुए पक्षकारों को हाई कोर्ट जाने को कहा था।

जस्टिस भुइयां ने लिखा, ‘भाईचारा अपने सहनागरिकों के प्रति सम्मान और आदर रखे बिना संभव नहीं। जाति, धर्म या भाषा से परे यह भावना विकसित करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक धर्म है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि फिल्म, व्यंग्य, कविता या कलात्मक अभिव्यक्ति को सिर्फ कुछ लोगों की आपत्ति के आधार पर रोका नहीं जा सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ‘विरोध’ या ‘अव्यवस्था की आशंका’ के नाम पर बंधक नहीं बनाया जा सकता। किसी फिल्म का मूल्यांकन समझदार दर्शक के नजरिए से किया जाना चाहिए, न कि अतिसंवेदनशील व्यक्तियों के अनुसार।

 

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