आज रखा पहला कदम ऑफिस मे ,
पूजनीय पिता जी की तस्वीर के सामने ,
शीश नवाया ,
हुआ महसूस ऐसा ,
जैसे सर पर मेरे ,
स्नेह से भरा हाथ फैराया ,
दूर कहीं से पिता का स्वर ,
कानो मे आया ,
बेटा अमरीश ………..
तूने ये फूलो का हार मुझे क्यूँ पहनाया ,
देख पिता की आँखो में ,
में बुदबुदाया ……
छोड़कर अपनी यादे आप यहाँ ,
चले गये आप ऐसे जँहा ,
जँहा से कोई लौट कर नही आता ,
फिर स्वर्ग वासी कहलाता ,
देने को अपनी श्रद्धांजलि ,
मेने ही ये हार चढ़ाया । …..
अचानक लगा ऐसा ,
जैसे पिता जी मुस्कुराये ,
हाँ सच है मैँ अब बैकुंठ मैँ लगा हूँ रहने ,
न…
नही आ पाता हूँ घर अब ,
सबसे कुछ कहने ,
पर तुम सबने जो घर को स्वर्ग बनाया ,
बैकुण्ठ से मैने भी सँदेश पाया ,
अब कभी भी आशियाना आ जाता हूँ ,
दे तुम सबको आशीर्वाद ,
बैकुंठ लौट जाता हूँ ,
बस फर्क इतना है ……
अब तुम सब मुझे देख नही पाओगे ,
पर करो महसूस मुझे ,
तो घर के जर्रे .. जर्रे में मुझे ही पाओगे ।
आ गया समझ में मेरी
मेरे पिता क्या है चाहते ,
तस्वीर पर माला का सँदेश ….
नही रहे पिता हमारे ……
वो देना नही चाहते …..
मान बात पिता की ,
मेने हाथ बढ़ाया ,
पिता जी के फोटो से ,
फ़ूलों का हार हटाया ।
देखपिता की आँखो में ……
एक अजीब सा सुकूँ पाया ।
मेरे पूजनीय पिता जी
स्वर्गीय सुरेश चँद अग्रवाल जी को समर्पित
मेरी किताब …( धरोहर ) से
अमरीश सुरेश अग्रवाल
( शिक्षाविद,मोटिवेशनल स्पीकर)