Homeन्यूज़इंडस्ट्री छोड़ने के बाद सिनेमा को मिस किया : चित्रांगदा

इंडस्ट्री छोड़ने के बाद सिनेमा को मिस किया : चित्रांगदा

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मुंबई। फिल्म हजारों ख्वाहिशें ऐसी में गीता राव जैसे सशक्त किरदार से बॉलिवुड में कदम रखने वाली अदाकारा चित्रांगदा सिंह इन दिनों मल्टीस्टारर मसाला एंटरटेनर फिल्म हाउसफुल 5 के लिए चर्चा में हैं। फिल्म बॉक्स आॅफिस पर अच्छा प्रदर्शन कर रही है। असल में मुझे सिनेमा से प्यार तब हुआ, जब मैंने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ी। मैंने हजारों ख्वाहिशें ऐसी और कल: यस्टरडे ऐंड टुमारो नाम की एक फिल्म की थी। उसके बाद 7-8 साल के लिए फिल्में छोड़ दी थीं, पर जब मैं सिनेमा से दूर रही, तब अहसास हुआ कि मैं सिनेमा को कितना मिस करती हूं। उसमें कितनी संतुष्टि, कितनी खुशी मिलती थी। ऐक्टिंग मुझे जिंदा महसूस करती थी, तब लगा कि मैं इसी के लिए बनी हूं। उससे पहले ये था कि हां, काम है, करते हैं। अरे वाह, सुधीर मिश्रा ने ये फिल्में बनाई हैं, वो आॅफर दे रहे हैं तो करते हैं लेकिन जब फिल्मों से दूर हुई तब उससे प्यार की शिद्दत का पता चला। मेरा सफर खूबसूरत रहा है, क्योंकि ऐक्टिंग ने मुझे खुद से मिलवाया।

मैंने अपनी पहली फिल्म के दौरान सुधीर (निर्देशक सुधीर मिश्रा) से कहा था कि आपने मुझे खुद से मिलवाया है, मेरी एक नई पहचान कराई है, क्योंकि मुझे नहीं पता था कि मुझमें ऐसा कोई टैलंट है या मैं अपनी जिंदगी में ऐसा कुछ कर सकती हूं, जिसके लिए मुझे याद किया जाए या सराहा जाए। इसलिए, जो भी मिला, वह बहुत बड़ा बोनस है। जो बेहिसाब प्यार मिला, पहचान मिली, उसके लिए मैं बहुत शुक्रगुजार हूं। लेकिन अगर मुझे बीस साल पहले वाली चित्रांगदा को सलाह देनी हो तो मैं कहूंगी कि बहुत मेहनत करो। सिर्फ सेट पर नहीं, सेट के बाहर भी कई चीजों पर फोकस करना पड़ेगा। चाहे लोगों से मिलना हो या अपना पीआर करना हो, यह भी हमारे काम का बहुत बड़ा हिस्सा है, जो मुझे पहले नहीं पता था। मुझे लगता था कि मेरे पास काम आएगा और जब काम आया तो मैंने पूरे दिल से उसे किया, लेकिन सेट के बाहर भी बहुत सारा काम करना होता है और वो समझना बहुत जरूरी है।

मैं प्रड्यूसर से ज्यादा ऐक्टर हूं। मैं खुद को पैशन प्रड्यूसर मानती हूं। मैंने सूरमा बनाई, क्योंकि वह एक असल हीरो की कहानी थी और मुझे लगा कि वह बननी चाहिए। मैं फुल टाइम प्रड्यूसर नहीं हूं। मैं जो अगली फिल्म भी बना रही हूं, उसकी वजह भी यही है, लेकिन हां, आज आॅडियंस के पास इतने आॅप्शन हैं, वे इंटरनैशनल सिनेमा देख रहे हैं, तो चैलेंज तो है कि लोगों को थिएटर में कैसे लेकर आएं और ये सिर्फ हमारी इंडस्ट्री में नहीं है, हर जगह ये देखने को मिल रहा है। हॉलिवुड भी इन चुनौतियों से गुजर रहा है। सुधार का तो मुझे पता नहीं, लेकिन जितनी अच्छी, सच्ची और रियल कहानी कही जाए, मुझे लगता है कि उतना लोग जुड़ेंगे।

 

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