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सम्मान के साथ मृत्यु का अधिकार: इच्छामृत्यु

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सम्मान के साथ मृत्यु का अधिकार: इच्छामृत्यु

– मानवीय गरिमा और भारतीय संविधान की संवेदनशील व्याख्या।


आदेश प्रधान एडवोकेट
– एडवोकेट आदेश प्रधान.

 एडवोकेट आदेश प्रधान। मानव जीवन को सृष्टि की सबसे मूल्यवान देन माना गया है। लगभग हर सभ्यता, धर्म और सामाजिक परंपरा में जीवन को पवित्र माना गया है और उसे बचाए रखना मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य समझा गया है। लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विकास ने जीवन और मृत्यु के प्रश्न को पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल बना दिया है। आज ऐसी परिस्थितियाँ सामने आती हैं जब कोई व्यक्ति असाध्य बीमारी, असहनीय दर्द और पूरी तरह चिकित्सकीय उपकरणों पर निर्भर जीवन के बीच वर्षों तक जीवित रहता है। ऐसे समय में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल जीवित रहना ही जीवन है या जीवन की गुणवत्ता, गरिमा और व्यक्ति की इच्छा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

 

 

 

इसी संदर्भ में इच्छामृत्यु या “दया मृत्यु” का विषय सामने आता है। इच्छामृत्यु का अर्थ सामान्य रूप से उस स्थिति से लगाया जाता है जब किसी असाध्य बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को उसकी इच्छा के अनुसार या विशेष परिस्थितियों में जीवन रक्षक उपचार से मुक्त कर दिया जाता है, ताकि वह असहनीय पीड़ा से मुक्ति पा सके। यह विषय केवल चिकित्सा विज्ञान का नहीं बल्कि नैतिकता, कानून, समाज और संवैधानिक अधिकारों का भी विषय है। भारत में इच्छामृत्यु को लेकर पिछले तीन दशकों में न्यायपालिका के स्तर पर कई महत्वपूर्ण फैसले हुए हैं, जिन्होंने इस बहस को संवैधानिक दृष्टि से समझने की दिशा दी है।

 

 

भारतीय संविधान में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान अनुच्छेद 21 में दिया गया है। इस अनुच्छेद के अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त वंचित नहीं किया जा सकता। समय के साथ न्यायपालिका ने इस अनुच्छेद की व्याख्या बहुत व्यापक रूप से की है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अनेक निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि जीवन का अधिकार केवल सांस लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा, सम्मान, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता और सुरक्षित वातावरण में जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है।
इसी व्यापक व्याख्या ने इच्छामृत्यु की बहस को संवैधानिक आधार दिया। यदि संविधान व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है, तो यह प्रश्न भी उठता है कि क्या व्यक्ति को अत्यधिक पीड़ा और असाध्य बीमारी की स्थिति में गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी होना चाहिए। यह प्रश्न भारतीय न्यायपालिका के सामने कई बार आया और धीरे-धीरे न्यायिक फैसलों के माध्यम से इसका उत्तर विकसित हुआ।

1990 के दशक में इच्छामृत्यु के संदर्भ में पहली बड़ी संवैधानिक बहस सामने आई। 1994 में P. Rathinam बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 309 पर विचार किया, जिसमें आत्महत्या के प्रयास को अपराध माना गया था। अदालत ने उस समय यह टिप्पणी की थी कि यदि किसी व्यक्ति को जीवन का अधिकार है तो उसे जीवन समाप्त करने का अधिकार भी हो सकता है। इस फैसले ने उस समय व्यापक बहस को जन्म दिया, क्योंकि यह पहली बार था जब अदालत ने जीवन और मृत्यु के अधिकार को एक साथ जोड़कर देखा।

हालांकि, यह निर्णय स्थायी नहीं रहा। 1996 में Gian Kaur बनाम पंजाब राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस निर्णय को पलट दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 में आत्महत्या करने का अधिकार शामिल नहीं है। लेकिन इस फैसले में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की गई। अदालत ने कहा कि “सम्मानजनक मृत्यु” की अवधारणा को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, विशेषकर तब जब कोई व्यक्ति असाध्य बीमारी या जीवन के अंतिम चरण में हो। इस टिप्पणी ने भविष्य में इच्छामृत्यु की बहस के लिए एक संवैधानिक आधार तैयार किया।

इसी पृष्ठभूमि में 2005 में सामाजिक संस्था Common Cause ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की। इस याचिका में अदालत से यह आग्रह किया गया कि असाध्य बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों को “लिविंग विल” बनाने का अधिकार दिया जाए। लिविंग विल का अर्थ है कि कोई व्यक्ति पहले से लिखित रूप में यह निर्देश दे सकता है कि यदि भविष्य में वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां वह निर्णय लेने में सक्षम न हो, तो उसके साथ किस प्रकार का उपचार किया जाए या न किया जाए। यह विचार व्यक्ति की स्वायत्तता और उसकी इच्छा के सम्मान से जुड़ा हुआ था।

इच्छामृत्यु की बहस को निर्णायक रूप से प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण मामला 2011 में सामने आया। यह मामला था Aruna Ramachandra Shanbaug बनाम भारत संघ। अरुणा शानबाग मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में नर्स थीं। 1973 में उनके साथ हुए एक हिंसक हमले के बाद वे स्थायी रूप से अचेत अवस्था में चली गईं और लगभग चार दशकों तक उसी स्थिति में रहीं। उनकी स्थिति को देखते हुए एक याचिका दायर की गई, जिसमें अदालत से उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति देने का अनुरोध किया गया।

इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। अदालत ने सक्रिय इच्छामृत्यु को अवैध बताया, लेकिन पहली बार कुछ परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी। अदालत ने कहा कि यदि कोई मरीज स्थायी रूप से अचेत अवस्था में है और उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, तो उचित चिकित्सा प्रक्रिया और न्यायिक अनुमति के बाद जीवन रक्षक उपचार हटाया जा सकता है। यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि इसने पहली बार यह स्वीकार किया कि असाध्य पीड़ा में जी रहे व्यक्ति की गरिमा को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

हालांकि, इस फैसले के बाद भी इच्छामृत्यु की प्रक्रिया काफी जटिल बनी रही। हर मामले में अदालत की अनुमति और चिकित्सकीय समितियों की राय आवश्यक थी। इसलिए व्यावहारिक रूप से यह व्यवस्था बहुत सीमित मामलों में ही लागू हो पाई। इसके बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसने इच्छामृत्यु की बहस को नई दिशा दी।

2018 में Common Cause बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने यह निर्णय दिया कि “सम्मान के साथ मरने का अधिकार” संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। अदालत ने “लिविंग विल” या अग्रिम चिकित्सा निर्देश को कानूनी मान्यता दी। इस फैसले में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति पहले से लिखित रूप में यह निर्देश देता है कि उसे जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे कृत्रिम रूप से जीवित न रखा जाए, तो उस इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए।

अदालत ने इस व्यवस्था को लागू करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश भी जारी किए। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार लिविंग विल को सत्यापित करने, चिकित्सकीय बोर्ड बनाने और उपचार संबंधी निर्णय लेने की एक स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित की गई। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि इच्छामृत्यु का दुरुपयोग न हो और हर निर्णय सावधानीपूर्वक और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत लिया जाए।

इच्छामृत्यु के संदर्भ में यह समझना भी आवश्यक है कि इसके दो प्रमुख रूप होते हैं—सक्रिय और निष्क्रिय। सक्रिय इच्छामृत्यु में किसी व्यक्ति को जानबूझकर घातक दवा या इंजेक्शन देकर उसकी मृत्यु सुनिश्चित की जाती है। भारत में यह अब भी अवैध है और इसे हत्या या आत्महत्या के लिए उकसाने के रूप में देखा जा सकता है। इसके विपरीत निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन रक्षक उपचार को हटाकर या रोककर प्राकृतिक मृत्यु होने दी जाती है। भारतीय न्याय व्यवस्था ने केवल इसी प्रकार की इच्छामृत्यु को सीमित परिस्थितियों में स्वीकार किया है।

यह विषय केवल कानून का नहीं बल्कि चिकित्सा नैतिकता का भी प्रश्न है। डॉक्टरों के लिए यह स्थिति अत्यंत कठिन होती है क्योंकि चिकित्सा का मूल सिद्धांत जीवन को बचाना है। लेकिन जब कोई मरीज असाध्य बीमारी से जूझ रहा हो और उसके ठीक होने की संभावना न हो, तब डॉक्टरों को यह तय करना पड़ता है कि क्या मशीनों के सहारे जीवन को लंबा करना सही है या मरीज की पीड़ा को कम करना अधिक मानवीय विकल्प है।

परिवार के लिए भी यह निर्णय अत्यंत भावनात्मक और कठिन होता है। किसी प्रिय व्यक्ति को खोने का डर एक ओर होता है, जबकि उसकी असहनीय पीड़ा को देखकर उसे मुक्ति दिलाने की इच्छा दूसरी ओर। यही कारण है कि इच्छामृत्यु के मामलों में भावनात्मक और नैतिक दुविधाएं बहुत गहरी होती हैं।
भारतीय समाज में यह विषय और भी संवेदनशील हो जाता है क्योंकि यहां परिवार और सामाजिक संरचना का महत्व बहुत अधिक है। कई बार यह आशंका भी व्यक्त की जाती है कि यदि इच्छामृत्यु को व्यापक रूप से कानूनी मान्यता दी जाए तो इसका दुरुपयोग भी हो सकता है। बुजुर्गों, विकलांगों या आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर दबाव डालकर उनसे ऐसी सहमति ली जा सकती है। इसलिए न्यायपालिका ने इस विषय पर बेहद सावधानी से और सीमित दायरे में निर्णय दिए हैं।

फिर भी यह स्पष्ट है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विकास के साथ यह प्रश्न भविष्य में और अधिक महत्वपूर्ण होता जाएगा। जैसे-जैसे जीवन रक्षक तकनीकें विकसित होंगी, वैसे-वैसे यह संभव होगा कि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक मशीनों के सहारे जीवित रखा जाए। ऐसे में यह तय करना आवश्यक होगा कि जीवन की गुणवत्ता और मानवीय गरिमा को किस प्रकार महत्व दिया जाए।

इच्छामृत्यु की बहस हमें एक गहरे दार्शनिक प्रश्न के सामने खड़ा करती है—क्या जीवन केवल सांसों के चलने का नाम है, या उसमें स्वतंत्रता, गरिमा और पीड़ा से मुक्ति भी शामिल है? यदि कोई व्यक्ति लगातार असहनीय दर्द में जी रहा है और उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, तो क्या उसे अपनी इच्छा से मृत्यु चुनने का अधिकार मिलना चाहिए?

भारतीय न्यायपालिका ने इस प्रश्न का कोई सरल उत्तर देने के बजाय संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। अदालत ने जीवन की पवित्रता को भी महत्व दिया है और व्यक्ति की गरिमा को भी। इसलिए सक्रिय इच्छामृत्यु को अवैध रखते हुए निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल को सीमित परिस्थितियों में अनुमति दी गई है।

साल 2026 में उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में हरीश राणा नामक व्यक्ति को इच्छा मृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दी। यह मामला हरीश राणा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के रूप में जाना गया। हरीश राणा कई वर्षों से कोमा (वेजिटेटिव स्टेट) में थे और उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं थी।

 

 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि “सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार” में “सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार” भी शामिल है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आता है।

यह निर्णय भारत में इच्छा मृत्यु से जुड़े कानून को स्पष्ट करने वाला और मानव गरिमा को महत्व देने वाला एक ऐतिहासिक फैसला माना है।

अंततः इच्छामृत्यु का प्रश्न हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि मनुष्य को केवल जीने का ही नहीं बल्कि सम्मान के साथ विदा लेने का अधिकार भी मिलना चाहिए या नहीं। जब जीवन असहनीय पीड़ा में बदल जाए और उम्मीद की सभी किरणें समाप्त हो जाएं, तब शायद सबसे बड़ा मानवीय कर्तव्य यही होता है कि उस व्यक्ति की गरिमा और उसकी इच्छा का सम्मान किया जाए। यही वह संवेदनशील संतुलन है जिसे भारतीय संविधान की मानवीय भावना और न्यायपालिका की व्याख्या धीरे-धीरे विकसित करने की कोशिश कर रही है।

नोट: संपादकीय पेज पर प्रकाशित किसी भी लेख से संपादक का सहमत होना आवश्यक नही है ये लेखक के अपने विचार है।

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