Homeउत्तर प्रदेशMeerutमेरठ: 521 यजकुंडों पर हुआ जनचेता यज्ञ

मेरठ: 521 यजकुंडों पर हुआ जनचेता यज्ञ

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धर्म एवं संस्कृति पर गर्व करना चाहिए : विवेकानंद सरस्वती

शारदा रिपोर्टर मेरठ। भारतीय नव वर्ष रौद्र नाम विक्रम संवत 2083 की प्रथम प्रभात पर मेरठ महानगर का महाराणा प्रताप प्रांगण एक अलौकिक दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। ओम ध्वजाओ एवं वैदिक सूक्तियां से सुसज्जित मैदान में 521 यजकुंडों पर भारतीय वेशभूषा में सुशोभित हुए यजमान वेद मंत्रों के उच्चारण से समस्त वातावरण को पावन कर रहे थे। अवसर था चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर आयोजित 29वें जन चेतना महायज्ञ का।

सर्वप्रथम सुशोभित मंच से मेरठ पब्लिक स्कूल की छात्राओं द्वारा ईश वंदना की गई ओम बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी। नव-वर्ष मंगलमय हो भजनों को प्रस्तुत करके समस्त वातावरण को ईश भक्तिभाव से सराबोर कर दिया। कार्यक्रम का संयोजन करते हुए मुख्य संयोजक राजेश सेठी ने यज्ञ को सर्वश्रेष्ठ कर्म बताते कहा कि यज्ञ मानव को समस्त दु:खों से छुड़ा कर समग्र एश्वर्य प्रदान करता है। चैत्र प्रतिपदा दिवस के ऐतिहासिक महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने इस दिन को सांस्कृतिक महापर्व के रूप में मनाने का अनुरोध किया।

 

521 यजकुंडों पर हुआ जनचेता यज्ञ

 

उन्होंने बताया कि आज के दिन संवत 1932 में महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना मुम्बई में की थी ।151 वर्ष पूर्ण होने पर इस दिवस का विशेष महत्व है। गुरुकुल प्रभात आश्रम टिकरी के कुलाधिपति विवेकानंद सरस्वती के ब्रह्मात्व में जनचेतना महायज्ञ का संपादन एपेक्स विश्वविद्यालय जयपुर के कुलपति डॉक्टर सोमदेव शतांशु एवं आचार्य वाचस्पति द्वारा किया गया। कार्यक्रम अध्यक्ष कुसुम शास्त्री, विक्रम शास्त्री द्वारा स्वामी जी का यज्ञ के ब्रह्मा के रूप में तिलक लगाकर एवं माल्यार्पण कर वरण किया गया।

 

 

गुरुकुल के अध्यक्ष विवेक शेखर, वेद प्रकाश सर्राफ, अश्वनी गुप्ता,प्रभात गुप्ता, डॉ जसवीर मलिक,नमन मलिक,हर्ष गोयल, अश्वनी गुप्ता,अजय गुप्ता, दयानन्द शर्मा, डॉ अर्पणा जैन, विश्व वसु, विपिन रस्तोगी द्वारा भी स्वामी जी का माल्यार्पण कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया गया। गुरुकुल के ब्रह्मचारियों ने सस्वर वेद मंत्रों का उच्चारण किया।

स्वामी जी ने कहा जनचेतना यज्ञ आरम्भ करने का उद्देश्य ही जनमानस को भारतीय नववर्ष को प्रचालन में लाने का था जो पूर्णतया सफल रहा है।उन्होंने कि हमें अपनी धर्म एवं संस्कृति पर गर्व करना चाहिए। पाश्चात्य संस्कृति एवं उसके दुष्प्रभावों का परित्याग कर अपने प्राचीन ऋषियों एवं महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा प्राप्त करनी चाहिए तभी हम अपने समाज और राष्ट्र को उत्तम बना पाएंगे।

 

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