यूजीसी बिल है मोदी जी का मास्टर स्ट्रोक।

हयात उमर | प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यूजीसी बिल की ऐसी गुगली फेंकी है कि क्या पक्ष और क्या विपक्ष सभी एक ही गेंद पर चित हो गए। राजनीति की पिच को समझना हर एक के बस की बात नहीं होती, लेकिन मोदी जी इस खेल के बादशाह हैं। यूजीसी बिल लाकर उन्होंने पूरे विपक्ष से न सिर्फ उसका मुद्दा छीन लिया है बल्कि एक झटके में बिखर रहे ओबीसी वोट को भी वापस अपने पाले में कर लिया है।

स्वर्णों को इस बात का बहुत गुरूर था कि वह राजनीति का रथ हांकते हैं। जिधर वोह जायेंगे उधर ही देश की राजनीति जाएगी। इस गुरूर को पहले तो वीपी सिंह ने मंडल कमीशन को लागू करके तोड़ा। फिर मुलायम और लालू जैसे नेताओं ने स्वर्णों को हाशिए पर धकेल दिया था। फिर भी स्वर्णों लगता था कि भाजपा उनके दम पर सत्ता में टिकी हुई है। जबकि हकीकत यह थी कि कितना भी मंदिर मस्जिद कर लें कितनी भी मुसलमानों से नफरत फैला लें लेकिन भाजपा के हाथ पूरी तरह से सत्ता की चाभी नहीं लग पा रही थी। जल्द ही संघ यह समझ गया कि बिना ओबीसी और दलितों को साथ लिए देश में सत्ता हासिल नहीं की जा सकती और इसीलिए भाजपा और संघ में ओबीसी नेताओं और दलितों को प्रमुखता मिलनी शुरू हुई। अटल जी का दौर जाते ही तमाम ब्राह्मण चेहरे पार्टी से किनारे कर दिए गए। राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेता को भी पार्टी ने द्वितीय पंक्ति में रखा और सामने आए पिछड़े वर्ग से निकले मोदी जी।
मोदी जी भी इस बात को बहुत अच्छे से समझते हैं कि कुल 18 प्रतिशत स्वर्णों की हिमायत से वोह कभी भी पूर्ण बहुमत नहीं हासिल कर सकते। हिंदुत्व की छतरी की छाया तभी बनी रहेगी जब इसको कोई पिछड़ा या दलित थमेगा। अगर स्वर्ण के हाथ हिंदुत्व का परचम गया तो पिछड़ा और दलित का भड़कना हमेशा संभावित रहेगा। 2024 के चुनाव में यह बात साफ हो गई कि जातिगत जनगणना, आरक्षण और उत्पीड़न के मुद्दे पर पिछड़ा दलित बेहद संवेदनशील है। उसे हिंदुत्व तभी तक प्यार है जब तक उसके हितों को कोई चोट नहीं पहुंच रही। 2024 के पहले पूर्ण बहुमत मिलने पर आरक्षण की समीक्षा, संविधान बदलने और बदलाव जैसे मुद्दों पर विपक्ष ने हुआ खड़ा करके भाजपा को लंगड़ी सरकार बनाने को मजबूर कर दिया।
मोदी जी ने इस खतरे को भांप लिया है। वोह जानते हैं कि स्वर्णों का सिर्फ भौकाल है। धरातल पर उनका राजनीतिक अस्तित्व बेहद कमजोर है। धर्म और नफरत की चाशनी में डूबा स्वर्ण समाज अंदर से पूरी तरह बिखरा हुआ है। ब्राह्मण ठाकुर की पुरानी लड़ाई अभी जारी है। फिर स्वर्ण समाज लाइन लगा कर उस तरह वोट नहीं करता जैसे ओबीसी, दलित या मुसलमान करते हैं। सबसे बड़ी बात पढ़ा लिखा स्वर्ण मुद्दों पर समर्थन या विरोध करता है जबकि अनपढ़ स्वर्ण अंधभक्त है।
यूजीसी एक्ट के विरोध में स्वर्णों के होहल्ले के बीच गौर कीजिए कि भाजपा के भीतर इस मुद्दे पर गहरी खामोशी है। कुछ एक छुटभैय्ए नेताओं को छोड़ कर कोई भी इस संवेदनशील मुद्दे पर जुबान नहीं खोल रहा। आश्चर्यजनक रूप से यूजीसी बिल आने के बाद विपक्ष को भी सांप सूंघ गया है। राजकुमार भाटी, चंद्रशेखर आजाद, राजद की प्रियंका जैसी मुखर मोदी विरोधी भी समर्थन में दिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर ओबीसी और दलित इंफ्लूएंसर बिल के समर्थन में हैं। सोचिए अगर दलित और ओबीसी नेतृत्व इस मुद्दे पर मोदी जी के कसीदे पढ़ रहा है तो समाज का क्या हाल होगा।
अब 18 प्रतिशत स्वर्ण समाज से पूरा वोट तो भाजपा के विरोध में कहीं चला नहीं जाएगा। और जाएगा भी तो कहां ? क्या विकल्प हैं उसके आगे। अब मोदी जी को छोड़ कर सवर्ण राहुल गांधी का समर्थन तो करने से रहा। न ही समाजवादी पार्टी या राजद को जाने वाला है। अब ले देकर मायावती या ल्लङ्म३ं का ही विकल्प बचता है। फिर भी स्वर्णों का एक बड़ा तबका हिंदू खतरे में है, राष्ट्रवाद, संघ के प्रति आसक्ति और मुसलमानों से नफरत के चलते अंतत: मोदी जी को ही वोट करेगा। यूपी में योगी जी का अपना ठाकुर वोट बैंक है, वोह हर हाल में भाजपा को ही जाएगा। अब 5-7 प्रतिशत वोट नाराज होकर हाथी या नोटा पर वोट कर भी देगा तो क्या फर्क पड़ेगा। जबकि 27 प्रतिशत पिछड़ा और 22 प्रतिशत दलित इस मुद्दे पर मोदी के सामने ढाल कर खड़ा है।
अगर मोदी जी ने सवर्णों के दबाव में आकर इस बिल को रोल बैक नहीं किया तो यकीनन देश की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा। दलित, ओबीसी और कुछ एक स्वर्ण वोट के दम पर मोदी जी सिर्फ यूपी समेत चार राज्यों के चुनाव में क्लीन स्वीप करेंगे बल्कि आगे की राजनीति की दिशा और दशा भी तय कर देंगे। विपक्ष इस मुद्दे पर असहाय है। उसके पास मोदी जी का समर्थन करने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं बचा है।
यूजीसी बिल न सिर्फ अखिलेश के ढऊअ को ध्वस्त कर देगा बल्कि राहुल के हाथ से जातिगत जनगणना का मुद्दा भी छीन लेगा। अगर दलित और ओबीसी साथ आ गया तो मुसलमानों की तरह स्वर्ण जाए भाड़ में। मोदी जी ने राजनीति का वोह दांव मारा है कि सभी चारों खाने चित हो गए हैं।
नोट: संपादकीय पेज पर प्रकाशित किसी भी लेख से संपादक का सहमत होना आवश्यक नही है ये लेखक के अपने विचार है।


