- पहला चरण 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2026 के बीच।
- पहली बार डिजिटल रूप में जनगणना।
नई दिल्ली: जनगणना के पहले चरण की अधिसूचना जारी हो गई है। पहला चरण 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2026 के बीच सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हो जाएगा। यह पहली बार डिजिटल रूप में होगा। कैसे होगी पूरी प्रक्रिया? डिजिटल जनगणना का अर्थ। जाति गणना का मकसद क्या है?

भारत एक बार फिर अपने सबसे बड़े और अहम सरकारी अभ्यास की तैयारी में है। अप्रैल 2026 से देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना शुरू होने जा रही है, और इस बार इसमें जाति आधारित गणना भी शामिल होगी। यानी करीब 90 साल बाद देश को फिर से पूरी जातिगत तस्वीर देखने को मिलेगी। केंद्र सरकार ने जनगणना के पहले चरण की अधिसूचना जारी कर दी है, जिसके तहत यह प्रक्रिया 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2026 के बीच सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पूरी की जाएगी। यह जनगणना सिर्फ आंकड़ों की गिनती नहीं होगी, बल्कि नीतियों, राजनीति और सामाजिक ढांचे को नई दिशा देने वाला डेटा बेस तैयार करेगी।
जनगणना क्या है और भारत में इसका इतिहास क्या रहा है?
जनगणना यानी देश में रहने वाले हर इंसान की गिनती और उसकी सामाजिक-आर्थिक जानकारी जुटाना। भारत में इसकी शुरुआत ब्रिटिश दौर में हुई थी। साल 1872 में पहली बार आबादी की गिनती की गई, 1881 से हर 10 साल में नियमित जनगणना होने लगी। आजादी के बाद 1951 से भारत में हर दशक जनगणना होती रही लेकिन एक बड़ा फर्क था, 1931 के बाद से भारत में सामान्य जातियों की गिनती बंद कर दी गई। आजादी के बाद सिर्फ SC और ST की संख्या दर्ज होती रही, बाकी OBC और अन्य जातियों का कोई पुख्ता डेटा कभी सामने नहीं आया, 2011 में सरकार ने सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर आधारित जातीय जनगणना करवाई मगर उसके आंकड़े जारी नहीं किए गए। यही वजह है कि आज भी देश में जाति को लेकर बहस तो होती है, लेकिन ठोस आंकड़ों की कमी बनी हुई है।

इस बार जनगणना में क्या नया है?
सरकार ने तय किया है कि 2027 की जनगणना डिजिटल होगी और इसमें जाति की जानकारी भी दर्ज की जाएगी। जनगणना दो चरणों में होगी।
1 अप्रैल से 30 सितंबर 2026 पहले चरण के दौरान घर-घर की लिस्टिंग (हाउसलिस्टिंग) होगी। इसमें ये जानकारी ली जाएगी कि घर पक्का है या कच्चा। बिजली, पानी, शौचालय की सुविधा है या नहीं और घर में कितने लोग रहते हैं। यह पूरी प्रक्रिया मोबाइल ऐप और टैबलेट से होगी।
दूसरे चरण में जनसंख्या की गणना फरवरी 2027 में होगी। इसमें हर व्यक्ति की जानकारी दर्ज होगी। हर शख्स की उम्र, शिक्षा, काम-धंधा, धर्म, जाति के डेटा को इकट्ठा किया जाएगा। हालांकि, बर्फ से प्रभावित क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड) में दूसरे चरण की जगगणना 1 अक्टूबर 2026 से होगी। इन क्षेत्रों में हाउसलिस्टिंग सितंबर 2026 में होगी।
डिजिटल जनगणना का मतलब क्या है?
अब तक जनगणना कागज-कलम, रजिस्टर और ढेर सारी फाइलों के इस्तेमाल से की जाती थीं। इस बार सब कुछ डिजिटल होगा। इससे फायदा ये होगा कि डेटा तुरंत सर्वर पर जाएगा। गलतियों की गुंजाइश कम होगी। डुप्लिकेट एंट्री नहीं होंगी। रियल-टाइम मॉनिटरिंग हो सकेगी और आंकड़े भी जल्दी जारी किए जा सकेंगे। ये भी संभव है कि सरकार लोगों को सेल्फ-एन्यूमरेशन यानी खुद अपनी जानकारी ऑनलाइन भरने का विकल्प दे सकती है।
जाति जनगणना क्यों इतनी अहम है?
भारत के पास जाति का कोई अपडेटेड डेटा ही नहीं है 1931 में अन्य पिछड़ी जातियां 52 फीसद थीं। मगर कई विश्लेषक ये मानते हैं कि उनकी संख्या अब 1931 की तुलना में कहीं अधिक है। आज भी देश में OBC आबादी कितनी है, यह केवल अनुमान पर आधारित है। देश में जाति आधारित आरक्षण है पर कौन सी जाति कितनी पिछड़ी है इसका डेटा पुराना हो चला है, 1931 में आखिरी बार ब्रिटिश सरकार ने जाति का पूरा ब्योरा जुटाया था। अब करीब 90 साल बाद, भारत खुद अपनी जातिगत तस्वीर देख पाएगा।
जाति जनगणना से यह पता चलेगा कि कौन से वर्ग कितना पिछड़ा है। सरकारी योजनाओं का फायदा किसे मिल रहा है, कौन छूट रहा है। जाति डेटा आने के बाद आरक्षण कोटे का लभा सही व्यक्ति तक पहुंचाया जा सकता है। जाति जनगणना से सरकार को सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक आधार पर समानता बनाने में मदद मिलेगी।
जाति जनगणना हमेशा से बड़ा राजनीतिक मुद्दा रही है। कुछ पार्टियां इसे सामाजिक न्याय मानती हैं तो कुछ इसे समाज बांटने वाला कदम। डेटा आने के बाद राजनीतिक रणनीतियां पूरी तरह बदल सकती हैं। आने वाले समय में लोकसभा और विधानसभा सीटों के नए बंटवारे में भी यह डेटा अहम हो सकता है।
हालांकि जाति जनगणना की कुछ चुनौतियां भी हैं। इस बार जनगणना डिजिटल तरीके से की जा रही है और जाति, धर्म जैसी जानकारी बेहद संवेदनशील डेटा हैं तो उनकी सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है। जाति के डेटा अगर सार्वजनिक हो गए तो कुछ इलाकों में असंतोष या टकराव की स्थिति भी पैदा हो सकती है। हालांकि, सरकार का कहना है कि डेटा सुरक्षा और गोपनीयता के लिए कड़े इंतजाम किए जाएंगे।
जनगणना में देरी क्यों हुई?
नियमानुसार 2021 में जनगणना हो जानी चाहिए थी पर तब यह कोविड के कारण टल गई थी। इसके बाद चूंकि यह पहली बार पूरी तरह डिजिटल प्रक्रिया के तहत की जा रही है तो तकनीकी तैयारी, ऐप डेवलपमेंट और राज्यों से समन्वय में समय लगा। लिहाजा, अब यह प्रक्रिया 2026-27 में पूरी करने की तैयारी है।
भारत की यह जनगणना ऐतिहासिक होगी। आजादी के बाद पहली बार केवल आबादी की गिनती नहीं होगी बल्कि जाति आधारित डेटा स्पष्ट और सटीक सरकारी नीति बनाने में अहम साबित होंगे। साथ ही सामाजिक न्याय की बहस डेटा आधारित होने की वजह से एक नए स्तर पर जाएगी। कुल मिलाकर, 2027 की जनगणना आने वाले दशकों की राजनीति, नीति और समाज की दिशा तय करने वाली है।

