Homeशहर और राज्यउत्तर प्रदेशलेदर इंडस्ट्री से एक्सपोर्ट माल के कंटेनर समुद्र में फंसे

लेदर इंडस्ट्री से एक्सपोर्ट माल के कंटेनर समुद्र में फंसे

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–  शिपिंग कंपनियों ने बढ़ाया 1500 डालर किराया, चेयरमैन के अनुसार नए आर्डर मिलना बंद

कानपुर। ईरान और इजरायल, अमेरिका युद्ध के कारण चमड़ा उद्योग को बड़ा नुकसान होने का अनुमान है। निर्यात करने वालों को आॅर्डर मिलना बंद हो गए हैं। दूसरी तरफ, जो माल कंटेनर से समुद्री रास्ते से भेजा गया था, वो रास्ते में फंस गया है। पिछले आॅर्डर का माल भेजने के लिए भी कंपनियों ने शिपिंग चार्ज बढ़ा दिया है। लेदर एक्सपोर्ट के रीजनल चेयरमैन का कहना है कि अगर युद्ध नहीं थमा, तो भविष्य में लेदर इंडस्ट्री से जुड़े लोग बेरोजगारी की कगार पर आ सकते हैं।

 

 

चेयरमैन असद कमाल इराकी ने बताया कि ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच युद्ध का असर चमड़ा उद्योग पर नुकसान के रूप में सामने आ सकता है। अब यह बात भी सामने आ रही है कि जिन लेदर कंपनियों ने अपना माल एक्सपोर्ट के लिए भेजा था, उनका माल शिपिंग में फंस गया है। पहले युद्ध के कारण चमड़ा उद्योग को लगभग 2000 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा था। लेकिन अब जिस तरह से चमड़े के निर्यात का माल फंस गया है, उससे चर्म उद्योग से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ गई है।

लेदर इंडस्ट्री एक्सपोर्ट के रीजनल चेयरमैन असद कमाल इराकी ने बताया कि अभी तक यूरोपीय देशों में एक कंटेनर की शिपिंग का किराया 1200 से 1500 डॉलर तक देना पड़ता था। लेकिन अब शिपिंग कंपनियों ने पहले से मिले आॅर्डर भेजने के लिए किराया लगभग दोगुना कर दिया है।
अब शिपिंग कंपनियां एक कंटेनर का किराया 2000 डॉलर से लेकर 3500 डॉलर तक बता रही हैं। इसके साथ ही यह भी साफ नहीं है कि हमारे कंटेनर वहां कब तक पहुंचेंगे। जो कंटेनर फंसे हुए हैं, उनके पहुंचने का समय भी शिपिंग कंपनियां स्पष्ट नहीं बता रही हैं। जो कंटेनर फंस गए हैं, उन्हें पहुंचने में अभी 10 से 15 दिन और लग सकते हैं।

असद ने बताया कि पहले यूरोपीय देशों में माल भेजने पर वह लगभग 4 हफ्ते में पहुंच जाता था। लेकिन जो माल भेजा जा चुका है, वह कई हफ्तों के लिए फंस गया है। ऐसे में हमें नए आॅर्डर भी मिलना बंद हो गए हैं और चमड़ा उद्योग के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

कानपुर और उन्नाव की लेदर इंडस्ट्री की बात करें तो पहले यहां 400 से ज्यादा लेदर फैक्ट्रियां हुआ करती थीं। लेकिन मौजूदा समय में लगभग 250 लेदर फैक्ट्रियां ही चल रही हैं। इनमें से करीब 30 प्रतिशत छोटी फैक्ट्रियां हैं, जो कच्चा माल तैयार करती हैं। जबकि 70 प्रतिशत फैक्ट्रियां ऐसी हैं, जहां से चमड़े का फिनिशिंग माल एक्सपोर्ट किया जाता है।

 

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