- जजों के खिलाफ 8630 शिकायतें मिली सीजेआई को।
- कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद को जानकारी दी।
नई दिल्ली। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद को जानकारी दी है कि वर्ष 2016 से अब तक सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के कार्यरत न्यायाधीशों के खिलाफ कुल 8630 शिकायतें भारत के मुख्य न्यायाधीश को प्राप्त हुई हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन शिकायतों की आवृत्ति हाल के वर्षों में बढ़ी है और कुल शिकायतों में से लगभग आधी वर्ष 2022 से 2025 के बीच आई हैं। ये सभी शिकायतें संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों से जुड़ी बताई गई हैं।

कानून मंत्री ने स्पष्ट किया कि ऐसी शिकायतों के निपटान के लिए सर्वोच्च न्यायालय की स्थापित आंतरिक प्रक्रिया लागू होती है। इस प्रक्रिया के तहत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतें सुनने का अधिकार मुख्य न्यायाधीश को है। इसी तरह उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के आचरण से जुड़ी शिकायतें संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश देखते हैं। सरकार को जो शिकायतें मिलती हैं, वे भी आगे आवश्यक कार्यवाही के लिए मुख्य न्यायाधीश या संबंधित मुख्य न्यायाधीश को भेज दी जाती हैं।
कानून मंत्री ने अपने लिखित उत्तर में कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान में निहित है और न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों का निपटान न्यायपालिका स्वयं अपनी आंतरिक व्यवस्था के माध्यम से करती है। यह आंतरिक प्रक्रिया वर्ष 1997 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित दो संकल्पों से विकसित हुई थी जिनमें न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्पाठ किया गया था। इन मूल्यों में आचरण के मानक और सिद्धांत तय किए गए हैं, जिनका पालन अपेक्षित है। यदि कोई न्यायाधीश इन मान्य मूल्यों का पालन नहीं करता तो सुधारात्मक कदम उठाने का भी प्रावधान है। इसके अलावा सरकार के पास एक केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी तंत्र भी है, जो एक आॅनलाइन मंच के रूप में काम करता है और विभिन्न मंत्रालयों तथा विभागों से जुड़ा है।
इसी परिप्रेक्ष्य में न्यायिक नेतृत्व पर भी महत्वपूर्ण विचार सामने आए हैं। नई दिल्ली में राष्ट्रमंडल न्यायिक शिक्षकों की बैठक के उद्घाटन अवसर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि जब न्यायाधीश स्वयं को पूर्ण और त्रुटिरहित मानने लगते हैं तब न्यायिक नेतृत्व को हानि होती है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि नियुक्ति के समय ही न्यायाधीश पूरी तरह तैयार और परिपूर्ण होते हैं, जबकि यह सोच संस्था के लिए हितकर नहीं है। उन्होंने कहा कि न्यायिक नेतृत्व इस कारण कमजोर नहीं होता कि न्यायाधीश अपूर्ण हैं, बल्कि तब होता है जब वह अपनी अपूर्णता को स्वीकार नहीं करते।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कुछ न्यायाधीश बहुत परिश्रम से कई मामलों की सुनवाई कर लेते हैं और निर्णय सुरक्षित रखते हैं, पर बाद में उन्हें समय पर जारी नहीं कर पाते। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी एक व्यक्ति पर टिप्पणी नहीं बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था के सामने चुनौती है, जिसका उपचार जरूरी है ताकि यह प्रवृत्ति फैले नहीं। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के साथ बैठक में चर्चा की जाएगी और समाधान खोजा जाएगा। उन्होंने कहा कि पहले भी निर्देश दिए जा चुके हैं कि हर निर्णय में आरक्षण, उच्चारण और अपलोड की तिथि साफ दर्ज हो।


