मुंबई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किराएदारी से जुड़ी छह याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किराएदारी रेगुलेशन एक्ट 2021 का विवरण देते हुए एक कानूनी सिद्धांत निर्धारित किया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि यदि मकान मालिक और किराएदार के बीच कोई रेंट एग्रीमेंट नहीं हुआ है या इसकी जानकारी रेंट अथॉरिटी को नहीं दी गई है तब भी मकान मालिक किराएदार को बेदखल करने के लिए आवेदन कर सकता है।

कोर्ट ने कहा कि प्रावधान से यह निष्कर्ष निकलता है कि 2021 के एक्ट के तहत रेंट अथॉरिटी का अधिकार क्षेत्र सिर्फ लिखित एग्रीमेंट और उसकी जानकारी रेंट अथॉरिटी को देने के मामलों तक सीमित नहीं किया जा सकता। अगर विधायिका ने मकान मालिक या किराएदार को सिर्फ लिखित एग्रीमेंट या उसकी जानकारी के मामलों में ही रेंट अथॉरिटी के पास जाने की सीमित सुविधा देने के बारे में सोचा होता तो सेक्शन 9 के सब-सेक्शन (5) का नियम कानून की किताब में नहीं होता. राज्य विधानमंडल की जानबूझकर की गई चूक के कारण 2021 के अधिनियम के तहत मकान मालिक के शीघ्र बेदखली के अधिकार से वंचित करने वाले गंभीर परिणाम नहीं होंगे।
हाईकोर्ट ने कहा कि पहले ही धारा 4 की उप-धारा (3) में आने वालेशब्द पर चर्चा की है क्योंकि यह किराया प्राधिकरण को किरायेदारी की जानकारी प्रदान करने के संबंध में सीमित उद्देश्य को पूरा करता है। एक बार जब मकान मालिक-किराएदार संबंध के बारे में कोई विवाद नहीं होता है तो उसमें इस्तेमाल किए गए शब्द से कोई फायदा नहीं उठाया जा सकता है। यह आदेश जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की सिंगल बेंच ने केनरा बैंक ब्रांच आॅफिस व अन्य और मेसर्स टिफको एंड एसोसिएट्स समेत छह अन्य की याचिका पर दिया है।
मामले के अनुसार सभी मामलों में याचिकाकर्ता जिन्हें चीफ जस्टिस के 5 मई 2025 के आदेशों द्वारा कोर्ट में नॉमिनेट किया गया। इसमें या तो कोई किराएदार है या मकान मालिक था। इन सबने इमारतों को आवासीय या व्यावसायिक उद्देश्य के लिए किराए पर दिया गया था। इनमें से पांच रिट याचिकाएं भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत जबकि छठा मामला प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 25 के तहत रउउ रिवीजन में दायर किया गया था।
कोर्ट में सभी जुड़े मामलों में ये मुद्दा उठाया गया कि क्या 2021 के एक्ट के प्रावधानों के तहत गठित रेंट अथॉरिटी के पास ऐसे मामलों में मकान मालिक द्वारा दायर आवेदन पर सुनवाई करने का अधिकार क्षेत्र है, जहां किराए का समझौता नहीं किया गया है और अगर समझौता नहीं किया गया है तो मकान मालिक रेंट अथॉरिटी के पास किराए की जानकारी दर्ज करने में विफल रहा है। सभी पक्षों के वकीलों की सहमति से इसे एक ही आदेश द्वारा सुना और तय किया गया।


