– लगातार हो रही घटनाओं के बाद भी जिम्मेदारों द्वारा नहीं लिया जा रहा कोई संज्ञान।
शारदा रिपोर्टर मेरठ। शहर में खुले और असुरक्षित नाले मानव जीवन पर गंभीर खतरा बने हुए हैं। जबकि, शहर के प्रमुख इलाकों में बिना रेलिंग के गहरे नाले हादसों को निमंत्रण दे रहे हैं। हाल ही में, इन नालों में ई-रिक्शा और कार गिरने की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें चालकों की जान पर बन आई।

जागृति विहार एक्सटेंशन की साउथ एक्स कॉलोनी में ड्राइविंग सीख रहे लोगों की कार खुले नाले में गिर गई। आबूलेन में सुरक्षा दीवार न होने के कारण ई-रिक्शा चालक सनी (42) की नाले में डूबने से मौत हो गई। जबकि, बीते समय की बात करें तो आजतक इन नालों में गिरकर दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है। लेकिन, सबकुछ जानते हुए भी संबंधित विभाग आंखें बंद करके बैठा है।
शहर में लगभग 341 नाले हैं, जिनमें से कई बिना रेलिंग के खुले हैं या सफाई के अभाव में दलदल बने हुए हैं। प्रशासन की निष्क्रियता से परेशान इन स्थानों पर नगर निगम और कैंट बोर्ड द्वारा सफाई के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन खतरों को उजागर करती है।
बता दें कि, हाल ही में नोएडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की तालाब में डूबकर हुई दर्दनाक मौत ने पूरे देश का ध्यान इस तरह के हादसों पर खींचा है, लेकिन मेरठ के लिए यह कोई नई या असाधारण घटना नहीं है। यहां नालों की बाउंड्री वॉल न होने के कारण ये नाले हर न केवल बरसात में शहर को डुबोते हैं। बल्कि, लोगों की जिंदगियां भी लील जाते हैं।
हालात यह हैं कि पिछले पांच वर्षों में नालों में गिरने से 37 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। तमाम संसाधन होने के बावजूद आखिर ये नाले हर साल जानलेवा क्यों बन जाते हैं, इस बाबत किसी की जिम्मेदारी क्यों नहीं तय होती और अंतत: समाधान क्यों अधूरे रह जाते हैं। इनमें से किसी भी सवाल का अधिकारियों के पास कोई जवाब नहीं है। शहर में जलभराव की सबसे बड़ी वजह जर्जर और अव्यवस्थित नाले हैं।
साल भर कूड़ेदान बने रहने वाले ये नाले बरसात में ओवरफ्लो होकर आसपास के इलाकों में पानी भर देते हैं। कई जगह बाउंड्री वॉल टूटी हुई है या है ही नहीं। खासतौर पर पुराने शहर के इलाकों में, जहां सीवर लाइन का अभाव है और नालों की नियमित सफाई नहीं होती, वहां हालात और भी खतरनाक हो जाते हैं। सिल्ट से भरे खुले नाले गिरने वालों के लिए मौत का कुआं साबित हो रहे हैं।
नगर निगम हर साल नालों को कवर करने, फेंसिंग और बाउंड्री वॉल के लिए डीपीआर बनाकर शासन को भेजता है, लेकिन डीपीआर फाइनल न होने से नाले खुले के खुले रह जाते हैं। शहर के घनी आबादी वाले इलाकों से करीब 257 नाले गुजरते हैं। ओडियन नाला, मोहनपुरी नाला और सुभाषनगर नाला जैसे बड़े नाले आबादी के बीचोंबीच बह रहे हैं, जहां कई जगह बाउंड्री वॉल गायब है। बरसात में नालों का पानी गलियों और घरों तक भर जाता है। खुले नालों के कारण छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए हादसे की आशंका बनी रहती है।
दरअसल, शहर में छोटे-बड़े नालों की कुल संख्या 309 है। इनमें 14 बड़े और 186 छोटे नाले शामिल हैं, साथ ही 111 नालियां भी हैं। तीन प्रमुख नाले ओडियन, आबूनाला एक और आबूनाला दो हैं। दिल्ली रोड, मोहनपुरी, कोटला, रुड़की रोड और बच्चा पार्क जलीकोठी प्रमुख छोटे नालों में शामिल हैं। करीब 127 नालियां सीधे बड़े नालों से जुड़ी हुई हैं। बरसात के दौरान नालों की सफाई पर हर साल 50 लाख रुपये से अधिक खर्च होते हैं। निगम के पास नालों की सफाई के लिए आठ जेसीबी और अन्य मशीनें उपलब्ध हैं। बड़े नालों की सफाई जेसीबी और बड़ी पोकलेन से, जबकि छोटे नालों की सफाई छोटी पोकलेन से कराई जाती है।
ये हैं प्रमुख नाले
आबू नाला, ओडियन दक्षिणी, मोहनपुरी एनएएस, मकाचीन, हाशिमपुरा, पांडव नगर, सुभाष नगर, मकबरा अब्बू, पीएसी रुड़की रोड, दिल्ली रोड नाला प्रमुख हैं।
हां ये बात सच है कि, बाउंड्री वॉल नहीं होने से लोगों की जान गई है। लेकिन यह भी सच है कि, नालों की नियमित रूप से सफाई कराई जाती है। जहां सिल्ट या गंदगी अधिक होती है, वहां जेसीबी से सफाई की जाती है। बाउंड्री वॉल और नालों की मरम्मत का काम निर्माण विभाग के स्तर पर चल रहा है। – डॉ. अमर सिंह, नगर स्वास्थ्य अधिकारी


