– कुलदीप सेंगर की बेल पर रोक और सोनम वांगचुक की रिहाई की मांग,
– लोकतांत्रिक चेतना का विस्फोट, ‘आजादी’ के नारों से गूंजा शहर।
शारदा रिपोर्टर मेरठ। लोकतंत्र, संविधान और जनअधिकारों के समर्थन में एक ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला, जब नागरिकों ने कुलदीप सेंगर की बेल पर रोक लगाने की मांग और रैमोन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की तत्काल रिहाई के समर्थन में एकजुट होकर सड़कों पर आवाज़ बुलंद की। इस दौरान मेरठ में पहली बार शहर की फिज़ा “आज़ादी… आज़ादी…” के नारों से गूंज उठी।

यह नारे किसी देश, संविधान या व्यवस्था के विरुद्ध नहीं थे, बल्कि अन्याय, दमन, प्रदूषण, भ्रष्टाचार और मनुवादी सोच से मुक्ति की जन-आवाज़ थे। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि यह संघर्ष किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ है जहाँ अपराधियों को संरक्षण मिलता है और आम नागरिक को न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

कुलदीप सेंगर की बेल पर रोक लगाने की मांग इसी व्यवस्था पर सवाल है। लोगों का कहना है कि जब गंभीर मामलों में भी आसानी से बेल मिल जाती है, तो कानून का भय समाप्त हो जाता है और अपराध को बढ़ावा मिलता है। जनता ने मांग की कि न्याय व्यवस्था में सख्ती और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।

इसी क्रम में सोनम वांगचुक की रिहाई की मांग को भी आंदोलन का अहम हिस्सा बनाया गया। सोनम वांगचुक लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की मांग को लेकर शांतिपूर्ण और अहिंसक संघर्ष कर रहे हैं। उनका आंदोलन न हिंसक है, न सत्ता-विरोधी, बल्कि संविधान के भीतर रहकर जनहित में संवाद की अपील है।
यह अत्यंत चिंताजनक है कि वर्ष 2018 में एशिया का नोबेल कहे जाने वाले प्रतिष्ठित “रैमोन मैग्सेसे अवार्ड” से सम्मानित व्यक्ति को लोकतांत्रिक मांगें उठाने के कारण दमन और हिरासत का सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति भारत की लोकतांत्रिक छवि और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
- मेरठ में गूंजे “आज़ादी” के नारे जनता की सामूहिक पीड़ा को व्यक्त करते हैं। लोगों ने कहा कि उन्हें
- प्रदूषण से आज़ादी चाहिए, जहाँ हवा और पानी ज़हर बनते जा रहे हैं।
- भ्रष्टाचार से आज़ादी चाहिए, जहाँ न्याय सिफारिश और पैसे का मोहताज हो गया है।
- मनुवादी और जातिवादी सोच से आज़ादी चाहिए, जो आज भी समाज को बांट रही है।
- डर से आज़ादी चाहिए, जहाँ सवाल पूछना अपराध बना दिया गया है।
- यह आंदोलन इस बात का संकेत है कि जनता अब मूक दर्शक बनकर अन्याय सहने को तैयार नहीं है। यह आवाज़ किसी दल, धर्म या जाति की नहीं, बल्कि संविधान, न्याय और इंसानियत की आवाज़ है।
इस अवसर पर एडवोकेट आदेश प्रधान ने कहा—“सोनम वांगचुक जैसे रैमोन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति का संघर्ष सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि संविधान के भीतर रहकर जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए है। उनकी आवाज़ को दबाना लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा हमला है।”
उन्होंने आगे कहा— “कुलदीप सेंगर की बेल पर रोक की मांग केवल एक केस नहीं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र की जवाबदेही का सवाल है। यदि बेल और संरक्षण के सहारे अपराध को बढ़ावा मिलता रहा, तो जनता का कानून से भरोसा टूट जाएगा।”
एडवोकेट आदेश प्रधान ने स्पष्ट शब्दों में कहा— “मेरठ की धरती से उठी ‘आज़ादी’ की यह आवाज़ देश को यह संदेश देती है कि जनता अब प्रदूषण, भ्रष्टाचार, मनुवाद और डर से मुक्ति चाहती है। यह आंदोलन संविधान को बचाने और लोकतंत्र को मजबूत करने का संघर्ष है, और यह तब तक जारी रहेगा जब तक न्याय सुनिश्चित नहीं होता।”
इस आंदोलन समर्थन करने वाले प्रमुख अनुज भड़ाना, आकाश भड़ाना, शशिकांत गौतम, शेरा जाट, दीपक शर्मा, राहुल अर्जक, राहुल वर्मा, आलोक बेशला, सागर बेसला, गौरव गिरि, रविंदर प्रधान, शन मोहम्मद, खालिद दुगरावली, दानिश राणा, गौरव राणा, नितिन गर्ग, शुभम भड़ाना, निशु प्रधान सहित बड़ी संख्या में जागरूक नागरिक।


