प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक निर्णय में कहा कि जन्म से एक व्यक्ति की जाति वही रहती है, भले ही वह व्यक्ति अपना धर्म ही क्यों न बदल ले और एक महिला के विवाह से उसकी जाति नहीं बदलती। न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने दिनेश और आठ अन्य लोगों द्वारा दायर आपराधिक अपील इस टिप्पणी के साथ खारिज कर दी। अलीगढ़ के विशेष न्यायाधीश (अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अधिनियम) ने आरोपियों को तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत अपराधों के लिए समन जारी किया था, जिसे आरोपियों ने चुनौती दी थी।

एक महिला ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया था कि इन सभी लोगों ने उस पर हमला किया और झगड़े के दौरान जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। इस घटना में महिला और दो अन्य लोग घायल हुए थे।
अपीलकतार्ओं ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि शिकायतकर्ता जन्म से अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखती है और मूलरूप से पश्चिम बंगाल की निवासी है लेकिन जाट समुदाय के एक व्यक्ति के साथ विवाह के बाद उसकी जाति बदल गई है, इसलिए एससी-एसटी अधिनियम के तहत अपराध के लिए समन जारी करना निराधार है।
कोर्ट ने 10 फरवरी को दिए आदेश में कहा, एक व्यक्ति अपना धर्म बदल सकता है, धर्मांतरण के बाद भी उसकी जाति वहीं रहती है। इसलिए विवाह से एक व्यक्ति की जाति नहीं बदलती। अत: उक्त दलील टिकने योग्य नहीं है।
हालांकि, राज्य के वकील ने इस आधार पर उनकी दलील का विरोध किया कि शिकायत में बताई गई घटना और एफआईआर में बताई गई घटना एक साथ हुई हैं। दोनों घटनाएं एक ही तारीख को हुई थीं। इसलिए यह कहा गया कि अपील करने वालों का यह दावा कि मौजूदा शिकायत जवाबी हमले के तौर पर दर्ज की गई थी, टिकने लायक नहीं है। इस पृष्ठभूमि में बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इंजरी रिपोर्ट के साथ-साथ इन्फॉर्मेंट और उसके गवाहों के बयानों पर विचार करने के बाद अपील करने वालों को बुलाया था। उसने यह भी कहा कि क्रॉस-केस होने से दूसरी पार्टी द्वारा दूसरे वर्जन पर फाइल की गई शिकायत को खारिज करने का आधार नहीं बनता है।


