- भाजपा विधायकों ने किया विरोध, पार्टी डैमेज कंट्रोल में।
नई दिल्ली। यूजीसी के नए नियम को लेकर बीजेपी के अंदर से ही विरोध उठने लगे हैं। बीजेपी के दिग्गज नेता बृजभूषण शरण सिंह के विधायक बेटे प्रतीक भूषण ने बिना नाम लिए यूजीसी के नियमों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इतिहास के दोहरे मापदंडों पर अब गहन विवेचना होनी चाहिए जहां बाहरी आक्रांताओं और उपनिवेशी ताकतों के भीषण अत्याचारों को ‘अतीत की बात’कहकर भुला दिया जाता है, जबकि भारतीय समाज के एक वर्ग को निरंतर ‘ऐतिहासिक अपराधी’ के रूप में चिन्हित कर वर्तमान में प्रतिशोध का निशाना बनाया जा रहा है।

कानपुर के बिठूर से बीजेपी विधायक अभिजीत सिंह सांगा ने भी यूजीसी के नए नियम पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा है कि इस कानून की सरकार को समीक्षा करनी चाहिए और सबकी सुरक्षा को सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि समाज को न्याय मिल सके। इसके अलावा बीजेपी एमएलसी देवेन्द्र प्रताप सिंह ने यूजीसी को पत्र लिखकर कहा कि प्रस्तावित प्रावधान सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचा सकते हैं और इससे उच्च शिक्षा व्यवस्था में जातीय तनाव बढ़ने की आशंका है। इससे देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो सकती है और समाज में जातीय संघर्ष को बढ़ावा मिल सकता है।
बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ संजय सिंह ने भी यूजीसी के नए नियम का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालात से शिक्षण संस्थानों में चिंता और आशंका का माहौल बन रहा है। यह भी कहा कि बिना संतुलित प्रतिनिधित्व के बनाई गई समितियां न्याय नहीं कर सकतीं। ऐसी समितियां सिर्फ औपचारिक निर्णय देती हैं, जिससे समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता। न्याय के पथ पर चलते हुए हर नागरिक के सम्मान और सुरक्षा की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। उनका कहना है कि निर्णय प्रक्रिया में सभी वर्गों की भागीदारी जरूरी है, ताकि किसी भी तरह की असमानता न रहे।
बीजेपी नेता डैमेज कंट्रोल में जुटे
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि मोदी है तो मुमकिन है। विश्वास रखिए यूजीसी के नोटिफिकेशन की सभी भ्रान्तियों को दूर किया जाएगा। संविधान को आर्टिकल 14 एवं 15 के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और सामान्य वर्ग में कोई फर्क नहीं है।
यूजीसी से जुड़े एक सवाल पर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि सवर्ण समाज नाराज नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की नीतियों का उद्देश्य किसी वर्ग को पीछे करना नहीं, बल्कि उन तबकों को आगे बढ़ाना है जो ऐतिहासिक रूप से विकास की दौड़ में पिछड़ गए हैं। उनका कहना था कि सामाजिक न्याय की प्रक्रिया में संतुलन आवश्यक है और सरकार उसी दिशा में काम कर रही है।


