नाले से किसानों की फसल हो रही है बर्बाद
हस्तिनापुर। थाना क्षेत्र के ग्राम राठौड़ा खुर्द में गांव के पानी की निकासी के लिए निर्माणाधीन नाला अब विकास कार्य से ज्यादा विवाद का विषय बनता जा रहा है। किसानों का सवाल सीधा है—जब गांव के पानी की निकासी के लिए पुराना नाला मार्ग मौजूद था और पुराने नक्शे में सड़क के दोनों ओर नाला दर्ज था, तो आखिर नाले का रुख बदलकर किसानों के खेतों के बीच से नया रास्ता क्यों निकाला जा रहा है?
जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत की ओर से गांव के पानी की निकासी के लिए नाले का निर्माण कराया जा रहा था। नाला किसानों के खेतों से होकर निकाला जा रहा था, जिसका कई किसानों ने विरोध किया। मामला बढ़ने पर थाना पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी मौके पर पहुंचे। बातचीत के बाद किसानों के खेतों से नाला निकालने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
लेकिन निर्माण शुरू होने के बाद मामला और पेचीदा हो गया। कुछ किसानों के खेतों तक नाला खोद दिया गया, जबकि आगे चार-पांच किसानों ने अपने खेतों से नाला निकालने की अनुमति नहीं दी। इसके चलते नाला निर्माण बीच में ही रुक गया। अब स्थिति यह है कि जिन खेतों में नाला खोदा जा चुका है, उन्हीं खेतों में गांव का गंदा पानी जमा होने लगा है। किसानों का कहना है कि पानी की निकासी आगे नहीं होने के कारण उनकी लाखों रुपये की फसलें खराब होने लगी हैं।
पुराने नक्शे में सड़क के दोनों ओर था नाला
किसानों का कहना है कि पुराने नक्शे के अनुसार राठौड़ा खुर्द से राठौड़ा बस स्टैंड की ओर जाने वाली सड़क के दोनों तरफ नाला था। यानी गांव के पानी की निकासी के लिए रास्ता पहले से निर्धारित था। आरोप है कि समय के साथ कुछ किसानों ने नाले में मिट्टी भरकर उसे बंद कर दिया और उसकी जगह को अपने खेतों में मिला लिया।
किसानों का कहना है कि यदि नाले की जमीन पर कहीं अतिक्रमण हुआ है तो उसे हटाकर पुराने रास्ते को बहाल किया जाना चाहिए, न कि नाले का रुख बदलकर दूसरे किसानों के खेतों में से नया नाला निकाला जाए।
चार साल पहले एक तरफ पक्का नाला बना, लेकिन पानी फिर भी नहीं निकला
मामले में एक और सवाल किसानों को परेशान कर रहा है। ग्रामीणों के अनुसार करीब चार वर्ष पहले ग्राम पंचायत की ओर से सड़क की एक तरफ पक्के नाले का निर्माण कराया गया था। लेकिन यदि पुराने नक्शे में सड़क के दोनों ओर नाला था तो दूसरी तरफ नाला क्यों नहीं बनाया गया?
किसानों का कहना है कि जिस तरफ पक्का नाला बनाया गया, उसमें भी गांव का पानी पर्याप्त रूप से पहुंच ही नहीं रहा है। यानी नाला बन गया, लेकिन गांव का पानी निकालने के लिए अब भी दूसरे नाले की जरूरत पड़ रही है।
ग्रामीणों का सवाल है कि जब नाला निर्माण की योजना बनाई गई थी, तब पानी की वास्तविक निकासी का रास्ता पहले क्यों नहीं देखा गया? यदि मौजूदा नाला गांव का पानी बाहर नहीं निकाल पा रहा था तो निर्माण से पहले इसकी तकनीकी जांच क्यों नहीं की गई?
500 मीटर की दूरी छोड़ 2 किलोमीटर का नाला क्यों?
किसानों ने इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल नाले की दूरी को लेकर उठाया है। ग्रामीणों के अनुसार राठौड़ा खुर्द से राठौड़ा बस स्टैंड की दूरी करीब 500 मीटर है, जबकि राठौड़ा खुर्द से बामनोली-सोती की दूरी लगभग दो किलोमीटर है।
किसानों का तर्क है कि जब गांव के पानी की निकासी का समाधान करीब 500 मीटर के पुराने रास्ते से किया जा सकता है तो करीब दो किलोमीटर लंबा नया नाला
बनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
और सवाल सिर्फ दूरी का नहीं है। यदि नया नाला बनाना ही है तो उसे किसानों के खेतों के बीच से निकालने की आवश्यकता क्यों है? किसानों का कहना है कि नाले के लिए वैकल्पिक रास्ता तलाशने के बजाय सीधे उनकी कृषि भूमि को निशाना बनाया जा रहा है।
नाला खुदा, पानी खेतों में भरा और फसलें होने लगीं बर्बाद
नाला निर्माण अधूरा रहने के कारण अब सबसे ज्यादा नुकसान उन किसानों को उठाना पड़ रहा है जिनके खेतों में नाला पहले ही खोदा जा चुका है। गांव का गंदा पानी खेतों में पहुंच रहा है, लेकिन आगे निकासी नहीं होने के कारण वहीं जमा हो रहा है।
किसान प्रदीप बवेजा, आदित्य नारंग, अमित बजाज,सतीश बजाज, सतीश बतरा,सहित अन्य किसानों का कहना है कि यदि पानी की निकासी की व्यवस्था नहीं हुई तो उनकी खड़ी फसलें बर्बाद हो जाएंगी।
किसानों का कहना है कि एक तरफ गांव का पानी निकालने के नाम पर नाला बनाया जा रहा है और दूसरी तरफ उसी नाले का पानी किसानों के खेतों में रोक दिया गया है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह निर्माण किस समस्या का समाधान कर रहा है?
एसडीएम मवाना को दिया ज्ञापन, पुराना रास्ता बहाल करने की मांग
फसल खराब होने और नाला निर्माण को लेकर बढ़ते विवाद के बीच किसानों ने उपजिलाधिकारी मवाना को ज्ञापन सौंपकर अपनी मांग रखी है।
किसानों की स्पष्ट मांग है कि खेतों के बीच से नाला निकालने की प्रक्रिया बंद कराई जाए और नाले को पुराने निर्धारित स्थान पर ही बनाया जाए। यदि पुराने रास्ते पर किसी ने मिट्टी भरकर नाले को बंद किया है अथवा नाले की जगह को अपने खेत में मिला लिया है तो उसकी जांच कराकर रास्ता खाली कराया जाए और उसी पुराने मार्ग से गांव के पानी की निकासी सुनिश्चित की जाए।
किसान प्रदीप बवेजा का कहना है कि यदि नाला पुराने रास्ते पर नहीं बनाया गया और किसानों के खेतों से नाला निकालने का प्रयास जारी रहा तो किसान आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
अब सवाल प्रशासन से—पुराना रास्ता छोड़ नया रास्ता क्यों?
पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सड़क के दोनों ओर नाले का पुराना रास्ता मौजूद था, एक तरफ पक्का नाला भी बन चुका है और गांव से बस स्टैंड की दूरी महज करीब 500 मीटर है, तो फिर नाले का रुख बदलकर करीब दो किलोमीटर दूर बामनोली-सोती की ओर ले जाने की जरूरत क्यों पड़ी?
यदि पुराने रास्ते पर नाला था तो उसे बंद करने और उसकी जगह को खेतों में मिलाए जाने की जांच क्यों नहीं हुई? यदि पुराने रास्ते पर अतिक्रमण है तो उसे हटाने के बजाय दूसरे किसानों के खेतों से नया रास्ता निकालने की जरूरत क्यों पड़ी?

